वाराणसी : पुलिस कस्टडी में मौत मामले में दरोगा, पोस्टमार्टम करने वाला डॉक्टर और विवेचक दोषी, 10 साल कारावास, 29 साल की कानूनी लड़ाई के बाद मिला न्याय
वाराणसी। लगभग तीन दशक पुराने सुंदरपुर पुलिस चौकी हिरासत में बंदी की मौत मामले में दरोगा, शव का पोस्टमार्टम करने वाला डॉक्टर और विवेचक दोषी पाए गए। दरोगा को 10 साल और विवेचक को 6 माह की सजा सुनाई गई। 29 वर्ष तक कानूनी लड़ाई के बाद पीड़ित परिवार को न्याय मिला।
29 वर्षों तक लगातार कानूनी संघर्ष करने के बाद राजेंद्र प्रसाद सिंह की पत्नी शशिमा सिंह दोषियों को सजा दिलाने में सफल रहीं। अदालत ने मामले में तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह को 10 वर्ष, विवेचक राधेश्याम सिंह को 6 माह तथा पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर के.के. जैन को 5 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है।
मामला वर्ष 1997 का है, जब सुंदरपुर पुलिस चौकी में राजेंद्र प्रसाद सिंह की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। पुलिस ने महज 100 मिनट के भीतर इसे आत्महत्या का मामला घोषित कर दिया था। हालांकि बाद में सीबीसीआईडी की जांच में कई ऐसे तथ्य सामने आए, जिन्होंने पुलिस की पूरी कहानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
जांच में पता चला कि राजेंद्र प्रसाद सिंह को अवैध रूप से पुलिस अभिरक्षा में रखा गया था। पुलिस ने उनकी मौत के बाद 100 रुपये की चोरी का मुकदमा दर्ज किया था। जिस दयाराम नामक व्यक्ति की तहरीर के आधार पर यह प्राथमिकी दर्ज की गई थी, उसकी जांच में पता चला कि उसका पता फर्जी था और ऐसा कोई व्यक्ति अस्तित्व में ही नहीं था। मिर्जापुर और चुनार क्षेत्र में की गई जांच में दयाराम को पूरी तरह काल्पनिक पाया गया।
सीबीसीआईडी जांच के अनुसार, पुलिस रिकॉर्ड में राजेंद्र को घटना वाले दिन शाम 5:15 बजे पुलिस अभिरक्षा में दिखाया गया था, जबकि मात्र 100 मिनट बाद शाम 6:55 बजे उनकी कथित आत्महत्या की सूचना दर्ज कर दी गई। इतना ही नहीं, परिजनों को बिना सूचना दिए अगले दिन तड़के करीब 5:30 बजे उनका पोस्टमार्टम करा दिया गया और हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम संस्कार भी कर दिया गया।
जांच अधिकारी श्रीकांत पांडे ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि सुंदरपुर पुलिस चौकी की प्रविष्टि संख्या 21 में राजेंद्र कुमार सिंह का पूरा विवरण, तलाशी संबंधी जानकारी अथवा गिरफ्तारी से जुड़ी आवश्यक प्रविष्टियां दर्ज नहीं थीं। यह भी स्पष्ट नहीं हो सका कि उन्हें हिरासत में लेने वाला पुलिसकर्मी कौन था।
बस विवाद के बाद चौकी लाई थी पुलिस
जांच में सामने आया कि घटना वाले दिन राजेंद्र कैंट क्षेत्र से बस में सवार हुए थे। बस में कुछ यात्रियों के साथ उनका विवाद हुआ, जिसके बाद पुलिस उन्हें चौकी लेकर आई थी। यदि उन्हें विधिवत गिरफ्तार किया गया था तो उन्हें थाना लंका के हवालात में रखा जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इससे पुलिस की कार्यप्रणाली और मंशा पर गंभीर सवाल खड़े हुए।
आत्महत्या की कहानी भी निकली झूठी
पुलिस ने दावा किया था कि राजेंद्र ने एक स्टूल पर खड़े होकर शॉल के सहारे फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली थी। लेकिन सीबीसीआईडी की जांच में यह कहानी भी संदिग्ध और तथ्यहीन पाई गई। जांच टीम को घटनास्थल और उपलब्ध साक्ष्यों में पुलिस के दावों की पुष्टि नहीं मिली।
जांच अधिकारियों ने यह भी सवाल उठाया कि सूर्योदय से पहले इतनी जल्दबाजी में पोस्टमार्टम क्यों कराया गया और परिजनों को इसकी सूचना क्यों नहीं दी गई। इस संबंध में पुलिस और संबंधित अधिकारियों के पास कोई संतोषजनक उत्तर नहीं था।
पुलिस ने जांच एजेंसी को भी किया गुमराह
सीबीसीआईडी की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि पुलिस ने जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाईं और जांच एजेंसी को गुमराह करने का प्रयास किया। आवश्यक अभिलेखों का अभाव, फर्जी प्राथमिकी, हिरासत से जुड़े दस्तावेजों की कमी तथा घटनाक्रम में मौजूद विरोधाभासों ने पुलिस की भूमिका को संदिग्ध बना दिया।
पत्नी के संघर्ष ने दिलाया इंसाफ
राजेंद्र प्रसाद सिंह की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी शशिमा सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने मानवाधिकार आयोग, राज्यपाल कार्यालय तथा सीबीसीआईडी समेत विभिन्न संस्थाओं का दरवाजा खटखटाया। 11 फरवरी 1997 से शुरू हुई उनकी न्याय की लड़ाई 29 वर्षों तक चली। लगातार प्रयास, दस्तावेजी साक्ष्य और प्रभावी पैरवी के बल पर आखिरकार अदालत ने दोषियों को सजा सुनाई।

