वाराणसी ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में रचा इतिहास, एक घंटे में 2,51,446 पौधे रोपकर बनाया विश्व रिकॉर्ड

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- मियावाकी तकनीकी से तैयार होने वाला डोमरी का शहरी वन बनेगा ऑक्सीजन बैंक
 

- चीन का वर्ष 2018 का रिकॉर्ड टूटा, चीन में रोपे गए थे 1 लाख 53 हजार पौधे
 

- गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुई ऐतिहासिक सफलता, टीम ने की सूक्ष्म निगरानी
 

- ड्रोन निगरानी, डिजिटल काउंटिंग सिस्टम से सत्यापन के बाद विश्व रिकॉर्ड की घोषणा  
 

- सेना, एनडीआरएफ, सीआरपीएफ के साथ ही काशीवासियों ने की सहभागिता 


वाराणसी। आध्यात्मिक नगरी काशी ने एक बार फिर विश्व पटल पर भारत का मान बढ़ाया है। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए वाराणसी ने मात्र एक घंटे में 2,51,446 पौधों का रोपण कर नया वैश्विक कीर्तिमान स्थापित किया है। सूजाबाद स्थित डोमरी क्षेत्र में आयोजित इस वृहद पौधरोपण अभियान ने वर्ष 2018 में चीन द्वारा बनाए गए रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया।

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इस ऐतिहासिक उपलब्धि की आधिकारिक पुष्टि के लिए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड की टीम सुबह से ही मौके पर मौजूद रही। निर्णायक ऋषि नाथ और विश्व रिकॉर्ड रणनीतिकार निश्चल बारोट ने पूरे अभियान की सूक्ष्म निगरानी की। ड्रोन कैमरों, डिजिटल काउंटिंग सिस्टम और भौतिक सत्यापन के बाद नए विश्व रिकॉर्ड की घोषणा की गई। मौके पर महापौर अशोक कुमार तिवारी को प्रमाणपत्र सौंपा गया।

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चीन का पुराना रिकॉर्ड टूटा
अब तक एक घंटे में सर्वाधिक पौधे लगाने का विश्व रिकॉर्ड चीन की हेनान प्रांतीय समिति और हेनान शिफांगे ग्रीनिंग इंजीनियरिंग कंपनी के नाम था। 10 मार्च 2018 को उन्होंने 1,53,981 पौधे रोपित कर यह उपलब्धि हासिल की थी, लेकिन काशी में मियावाकी तकनीक के माध्यम से सुनियोजित ढंग से किए गए पौधरोपण ने न केवल उस रिकॉर्ड को तोड़ा, बल्कि उसे काफी पीछे छोड़ दिया।

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350 बीघा में आधुनिक ‘शहरी वन’
सूजाबाद डोमरी के लगभग 350 बीघा क्षेत्र में विकसित किए जा रहे इस ‘शहरी वन’ को आधुनिक सोच और पारंपरिक आस्था के अनूठे संगम के रूप में तैयार किया गया है। पूरे क्षेत्र को 60 अलग-अलग सेक्टरों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक सेक्टर का नाम काशी के प्रसिद्ध गंगा घाटों - दशाश्वमेध, मणिकर्णिका, केदार, ललिता, चौशट्टी, मानमंदिर और शीतला घाट के नाम पर रखा गया है।

 

भविष्य में जब ये पौधे वृक्षों का रूप लेंगे, तो यह क्षेत्र गंगा किनारे बसे एक हरित ‘मिनी काशी’ जैसा दृश्य प्रस्तुत करेगा। यह अवधारणा न केवल पर्यावरण संरक्षण को समर्पित है, बल्कि काशी की सांस्कृतिक पहचान को भी संरक्षित करती है।

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देशी प्रजातियों को प्राथमिकता
इस अभियान में 27 से अधिक देशी प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। इनमें शीशम, अर्जुन, सागौन और बांस जैसे छायादार वृक्षों के साथ आम, अमरूद और पपीता जैसे फलदार पौधे शामिल हैं। औषधीय महत्व को ध्यान में रखते हुए अश्वगंधा, शतावरी और गिलोय जैसी जड़ी-बूटियों को भी रोपित किया गया है।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि विविध प्रजातियों का यह मिश्रण क्षेत्र की जैव विविधता को मजबूत करेगा और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखेगा। आने वाले वर्षों में यह वन न केवल पर्यावरणीय लाभ देगा, बल्कि नगर निगम के लिए आय का स्रोत भी बनेगा।

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जनभागीदारी का विराट उदाहरण
इस रिकॉर्ड को स्थापित करने के पीछे हजारों हाथों का सामूहिक श्रम और महीनों की तैयारी रही। अभियान में सुरक्षा बलों, सरकारी विभागों, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसमें भारतीय सेना की विभिन्न इकाइयों, एनडीआरएफ, सीआरपीएफ, नागरिक सुरक्षा और उत्तर प्रदेश पुलिस की पीएसी वाहिनियों ने अनुशासन और समर्पण के साथ भागीदारी की। नमामि गंगे, वन विभाग, कृषि विभाग, डूडा और नगर निगम की टीमों ने तकनीकी सहयोग और व्यवस्थापन संभाला।

 

काशी विद्यापीठ सहित कई शिक्षण संस्थानों के हजारों छात्र-छात्राओं, एनसीसी कैडेट्स और एनएसएस स्वयंसेवकों ने इस अभियान को जन-आंदोलन का रूप दे दिया। सुबह से ही डोमरी क्षेत्र में ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष के साथ उत्साह का माहौल बना रहा।

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मियावाकी तकनीक से तैयार होगा ‘ऑक्सीजन बैंक’
इस विशाल पौधरोपण अभियान में जापानी वनस्पति वैज्ञानिक अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित प्रसिद्ध मियावाकी तकनीक का उपयोग किया गया है। यह तकनीक कम स्थान में घना जंगल विकसित करने के लिए जानी जाती है। इसके तहत पौधे सामान्य वृक्षारोपण की तुलना में 8 से 10 गुना तेजी से बढ़ते हैं और दो से तीन वर्षों में सघन वन का रूप ले लेते हैं।

पौधों के संरक्षण के लिए प्रशासन ने व्यापक इंतजाम किए हैं। पूरे क्षेत्र में 10,827 मीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई है। 10 बोरवेल और 360 ‘रेन गन’ सिस्टम के जरिए आधुनिक और जल-संरक्षण आधारित सिंचाई व्यवस्था की गई है। इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि पौधे जीवित रहें और आने वाले समय में यह क्षेत्र एक सघन ‘ऑक्सीजन बैंक’ के रूप में विकसित हो।

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इस उपलब्धि के गदगद महापौर अशोक कुमार तिवारी ने कहा कि यह उपलब्धि काशी की सामूहिक शक्ति और पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रेरणा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मार्गदर्शन में काशी ने यह साबित कर दिया है कि वह केवल आध्यात्मिक नगरी ही नहीं, बल्कि वैश्विक पर्यावरणीय नेतृत्व के लिए भी तैयार है। ढाई लाख पौधों की यह सौगात आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित भविष्य का आधार बनेगी।”

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पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम
विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्तर का सुनियोजित पौधरोपण शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण नियंत्रण, तापमान संतुलन और भू-जल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। बढ़ते शहरीकरण के बीच यह पहल एक अनुकरणीय मॉडल के रूप में उभरी है। डोमरी का यह शहरी वन आने वाले समय में न केवल काशी की हरित पहचान बनेगा, बल्कि विश्व के अन्य शहरों के लिए भी प्रेरणा स्रोत साबित होगा।

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काशी ने यह दिखा दिया है कि जब प्रशासनिक इच्छाशक्ति, तकनीकी दक्षता और जनभागीदारी एक साथ आती है, तो असंभव भी संभव हो जाता है। एक घंटे में 2,51,446 पौधे रोपकर रचा गया यह इतिहास आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रेरित करता रहेगा।

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