गंगा संरक्षण के लिए कछुए छोड़े, पर्यावरण को बचाने का दिया संदेश

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वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) स्थित महामना मालवीय गंगा शोध केंद्र बीते छह वर्षों से गंगा संरक्षण और डॉल्फिन बचाव के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है। यह केंद्र प्रयागराज से बलिया तक 700 गंगा मित्रों और 30,000 जल-संरक्षकों की टीम के साथ मिलकर गंगा की स्वच्छता और जलीय जीवों के संरक्षण के लिए प्रयासरत है।

इसी क्रम में, रविवार को गंगा डॉल्फिन मित्र कॉर्डिनेटर धर्मेंद्र पटेल ने रविदास घाट पर एक बड़ा कछुआ गंगा में छोड़ा। उन्होंने बताया कि वह हर महीने कम से कम एक कछुआ गंगा में छोड़ते हैं। ऐसा केवल लोगों की जागरूकता के कारण संभव हो पाया है। जब कहीं कछुआ दिखाई देता है, तो स्थानीय लोग उन्हें सूचित करते हैं, और वह कछुए को सुरक्षित रूप से गंगा में छोड़ देते हैं।

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गंगा सफाई में कछुओं की भूमिका
धर्मेंद्र पटेल ने बताया कि कछुए गंगा की सफाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी खाने की आदतें गंगा को स्वच्छ बनाए रखने में सहायक होती हैं। कछुए मांसाहारी होते हैं और अधजले शवों, फेंके गए फूल-मालाओं और अन्य जैविक अपशिष्टों को खाकर नदी को साफ करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ लोग नदियों में जलीय जीवों का शिकार करते हैं, जो कि गलत है। कछुआ, घड़ियाल, मेढ़क, झींगे, घोंगे और कई मछलियां गंगा की प्राकृतिक सफाई व्यवस्था का हिस्सा हैं। अगर इन्हें नुकसान पहुंचाया जाता है, तो गंगा की स्वच्छता प्रभावित होती है।

नदियों के जलीय जीवों का संरक्षण जरूरी
धर्मेंद्र पटेल ने गंगा में रहने वाले जीवों को सुरक्षित रखने की अपील की। उन्होंने कहा कि यदि हम गंगा को स्वच्छ और जीवंत बनाए रखना चाहते हैं, तो इन जलीय जीवों की रक्षा करनी होगी। पर्यावरण संरक्षण में सभी की भागीदारी आवश्यक है, और गंगा को बचाने के लिए प्राकृतिक सफाईकर्मी जीवों का संरक्षण जरूरी है। गंगा मित्रों और जल-संरक्षकों की इस पहल से नदी की सफाई और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण योगदान मिल रहा है।

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