बनारस की रहस्यमयी धरोहर : 150 साल पुरानी देवकीनंदन हवेली, 10 बीघे में फैली 5 मंजिला आलीशान हवेली में एक दिन भी रह सके बनवाने वाले मालिक 

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वाराणसी। काशी की पहचान केवल मंदिरों, घाटों और संकरी गलियों तक सीमित नहीं है। इस प्राचीन नगरी की हर गली, हर मोहल्ला और हर पुरानी इमारत अपने भीतर इतिहास का एक अनकहा अध्याय समेटे हुए है। इन्हीं विरासतों में शामिल है रामापुरा स्थित करीब 150 वर्ष पुरानी बाबू देवकीनंदन की हवेली, जिसकी भव्यता आज भी लोगों को आकर्षित करती है। पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी, विशाल बरामदे और शानदार स्थापत्य कला इस हवेली को बनारस की ऐतिहासिक धरोहरों में अलग पहचान देते हैं। लेकिन इस हवेली की सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसे बनवाने वाले बाबू देवकीनंदन स्वयं इसमें एक दिन भी नहीं रह सके।

वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु राज पांडेय के अनुसार, बाबू देवकीनंदन मूल रूप से प्रयागराज के निवासी थे। ब्रिटिश शासनकाल में उनका अंग्रेज अधिकारियों से अच्छा संबंध था। इसी कारण अंग्रेज सरकार ने उन्हें वाराणसी के रामापुरा क्षेत्र की प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके बाद उन्होंने प्रयागराज छोड़कर काशी में अपना स्थायी निवास बनाने का निर्णय लिया।

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10 बीघे में बनवाई थी आलीशान हवेली
रामापुरा क्षेत्र में लगभग 10 बीघे भूमि पर बाबू देवकीनंदन ने उस समय की आधुनिक सोच और भारतीय स्थापत्य शैली का अद्भुत संगम प्रस्तुत करने वाली एक विशाल हवेली का निर्माण कराया। पत्थरों से निर्मित इस भवन में बारीक नक्काशी, बड़े-बड़े दरवाजे, ऊंची छतें और प्राकृतिक रोशनी व हवा के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। हवेली का प्रत्येक हिस्सा उस दौर की समृद्ध वास्तुकला का उदाहरण माना जाता है।

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एक लिफ्ट ने बदल दी पूरी कहानी
इस हवेली से जुड़ी सबसे चर्चित कहानी उस समय की है, जब अंग्रेज सरकार ने विशेष आदेश पर इंग्लैंड से केवल तीन आधुनिक लिफ्ट भारत मंगवाई थीं। बाबू देवकीनंदन चाहते थे कि उन तीन लिफ्टों में से एक उनकी हवेली में स्थापित हो, ताकि उनकी कोठी उस दौर की सबसे आधुनिक इमारतों में शामिल हो सके।

बताया जाता है कि उन्होंने इसके लिए हरसंभव प्रयास किए, लेकिन किसी कारणवश उन्हें लिफ्ट नहीं मिल सकी। इस घटना से वे इतने आहत हुए कि उन्होंने अपनी नई हवेली में रहने का विचार ही त्याग दिया। कहा जाता है कि इसके बाद उन्होंने वाराणसी छोड़ दिया और फिर कभी लौटकर इस हवेली में रहने नहीं आए।

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पांच मंजिला हवेली में हैं 48 कमरे
करीब डेढ़ शताब्दी पुरानी यह हवेली आज भी अपनी भव्यता की कहानी बयां करती है। पांच मंजिला इस विशाल भवन में कुल 48 कमरे हैं, जिनमें प्राकृतिक हवा और रोशनी की उत्कृष्ट व्यवस्था की गई है। हवेली के चौड़े बरामदे, विशाल आंगन और पत्थरों पर उकेरी गई कलात्मक नक्काशी आज भी उस दौर की शिल्पकला का प्रमाण प्रस्तुत करती है।

समय की मार झेल रही ऐतिहासिक धरोहर
समय के साथ हवेली के कुछ हिस्से जर्जर हो चुके हैं, लेकिन इसकी वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व आज भी लोगों को आकर्षित करता है। इतिहास प्रेमी, शोधकर्ता और पर्यटक इस हवेली को देखने पहुंचते हैं और इसके पीछे छिपी उस अनोखी कहानी को जानने की कोशिश करते हैं, जिसमें एक भव्य महल तो बन गया, लेकिन उसका मालिक कभी उसमें रहने नहीं आया।

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विरासत संरक्षण की जरूरत
इतिहासकारों का मानना है कि बनारस की ऐसी धरोहरें केवल इमारतें नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्मृतियों का हिस्सा हैं। यदि इनका समय रहते संरक्षण और संवर्धन किया जाए तो आने वाली पीढ़ियां भी काशी के गौरवशाली अतीत और उसकी अनूठी स्थापत्य विरासत से परिचित हो सकेंगी।

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