काशी का गंगा घाट बना घर, अपनों ने छोड़ा, गैर ने थामा हाथ

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वाराणसी। "बे-वक़्त अगर जाऊंगा सब चौंक पड़ेंगे... इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा" - यह शायरी सिर्फ अल्फाज़ नहीं, बल्कि काशी के 70 वर्षीय रामदास गुजराती की जीती-जागती हकीकत बन चुकी है। एक ऐसा जीवन, जिसमें घर से बेदखली के बाद गंगा घाट ही ठिकाना बन गया और अब वही घाट उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा का गवाह बना है।

घर से घाट तक का सफर: एक दर्दनाक सच्चाई
काशी के पक्के महाल चौखंभा के रहने वाले रामदास गुजराती का जीवन दो दशक पहले अचानक बदल गया, जब घरवालों ने उन्हें अपने ही आशियाने से बाहर कर दिया। अपनों की बेदखली ने उन्हें ऐसा झटका दिया कि उन्होंने गंगा के घाटों को ही अपना ठिकाना बना लिया। दिन हो या रात, घाट की सीढ़ियां ही उनका सहारा बनीं, और गंगा का किनारा उनका घर।

बालाजी घाट: जहां संगीत और साधना का संगम
रामदास गुजराती का जीवन बालाजी घाट से गहराई से जुड़ गया। यह वही स्थान है, जहां कभी भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां शहनाई का रियाज किया करते थे। मंदिर के नौबतखाने में बैठकर वे घंटों सुरों की साधना करते थे। उसी पावन वातावरण में रामदास गुजराती ने भी अपनी दिनचर्या बना ली थी। सुबह-शाम गंगा स्नान, फिर प्रभु का ध्यान-यही उनकी जिंदगी का क्रम बन गया था। घाट की शांति और आध्यात्मिकता ने उनके अकेलेपन को एक सहारा जरूर दिया, लेकिन भीतर का खालीपन कभी पूरी तरह नहीं भर सका।

अचानक आई जिंदगी की सबसे बड़ी चोट
रविवार की शाम, जब रामदास गुजराती बालाजी घाट पर गंगा स्नान कर रहे थे, तभी अचानक उन्हें हार्ट अटैक आ गया। घाट पर मौजूद लोग सकते में आ गए, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि इस मुश्किल घड़ी में उनका कोई अपना वहां नहीं पहुंचा। न परिवार, न कोई मित्र—चारों तरफ भीड़ थी, लेकिन उनके लिए कोई अपना नहीं था।


एक फरिश्ता बनकर पहुंचे अमन कबीर
इसी बीच लावारिस मरीजों की सेवा करने वाले समाजसेवी अमन कबीर Aman Kabir Trust मौके पर पहुंचे। उन्होंने बिना देर किए रामदास गुजराती की हालत को समझा और तुरंत डायल 112 को सूचना दी। पुलिस मौके पर पहुंची और उन्हें मंडलीय अस्पताल कबीरचौरा ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें आईसीयू में भर्ती कर लिया। इस समय रामदास गुजराती जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं।

अपनों ने मोड़ा मुंह, गैर बना सहारा
अमन कबीर ने रामदास गुजराती के परिवार से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन वहां से निराशा ही हाथ लगी। उनके भाई ने फोन पर पहले रॉन्ग नंबर कहकर कॉल काट दिया, और दोबारा संपर्क करने पर सुनने में असमर्थता जताकर बात टाल दी। जबकि हकीकत यह थी कि संपर्क सही था और आवाज भी स्पष्ट थी। इस व्यवहार ने यह साफ कर दिया कि परिवार ने उनसे पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया है। 

रामदास गुजराती की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस समाज का आईना है, जहां अपनों के होते हुए भी कोई अपना नहीं होता। गंगा के घाटों ने उन्हें शरण दी, लेकिन आज जब जिंदगी दांव पर लगी है, तो एक अजनबी ही उनका सबसे बड़ा सहारा बनकर खड़ा है।

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