पांडवों ने की थी शिवलिंग की स्थापना, लगाया था बाटी-चोखा का भोग, पांचों शिवाला मंदिर का पांच हजार साल पुराना है इतिहास 

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रामेश्वर से आधा किलोमीटर दूर स्थित है प्राचीन शिवालय, लोटा-भंटा मेले के लिए भी प्रसिद्ध है मंदिर

 

पांडवों से जुड़ी है स्थापना की मान्यता, रामेश्वर से करीब आधा किलोमीटर दूर है मंदिर

 

मंदिर परिसर में द्रौपदी कुंड भी है आस्था का केंद्र, लोटा-भंटा मेले के लिए प्रसिद्ध है क्षेत्र

सावन और महाशिवरात्रि पर उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़, पांच हजार साल पुराना है मंदिर का इतिहास 

रिपोर्ट - ओमकार नाथ

वाराणसी। काशी की धार्मिक और पौराणिक परंपरा में महाभारत काल और पांडवों के अज्ञातवास से जुड़े कई स्थल हैं। पिंडरा तहसील के रसूलपुर गांव स्थित पांचों शिवाला मंदिर भी इन्हीं में से एक है। मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव काशी पहुंचे थे और पंचकोशी यात्रा के क्रम में इस स्थान पर कुछ समय ठहरे थे। इसी दौरान पांचों पांडवों ने भगवान शिव की आराधना कर यहां शिवलिंग स्थापित किया था।

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रामेश्वर से करीब आधा किलोमीटर दूर स्थित यह प्राचीन शिवालय धार्मिक आस्था के साथ अपनी लोक परंपराओं के लिए भी प्रसिद्ध है। मंदिर परिसर में भगवान शिव के प्रमुख शिवलिंग के साथ सूर्य नारायण, भगवान गणेश, माता अन्नपूर्णा और श्रीराम दरबार के विग्रह विराजमान हैं। मंदिर परिसर में पंच शिवालय की स्थापत्य परंपरा की झलक भी दिखाई देती है।

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पांचों पांडवों से जुड़ी है मंदिर की मान्यता
मंदिर के पुजारी जितेंद्र मिश्रा और आचार्य रमेश तिवारी के अनुसार, इस स्थान की स्थापना पांचों पांडवों से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि उस समय पूरा क्षेत्र घने जंगल से घिरा था। पांडव जब रामेश्वर से आगे बढ़े तो तीसरे पहर के बाद क्षेत्र में अंधेरा होने के कारण आगे का रास्ता दिखाई देना मुश्किल हो जाता था। इसी स्थान पर उन्होंने विश्राम किया और भगवान शिव की पूजा के लिए शिवलिंग स्थापित किया।

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मान्यता के अनुसार पूजा के बाद पांडवों ने यहां बाटी-चोखा तैयार किया। पहले भगवान शिव को भोग अर्पित किया और फिर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया। इसके बाद वे आगे की यात्रा पर निकल गए। इसी घटना की स्मृति में बाद में यहां लोटा-भंटा मेले की परंपरा शुरू होने की मान्यता है।

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पांच शिवालयों की परंपरा से पड़ा ‘पांचों शिवाला’ नाम
स्थानीय लोगों के अनुसार पांचों पांडवों और पांच शिवालयों की परंपरा से मंदिर का नाम ‘पांचों शिवाला’ पड़ा। मंदिर का शिखर भी पंच शिव मंदिर की स्थापत्य परंपरा की याद दिलाता है। वर्तमान में गर्भगृह के मध्य भगवान भोलेनाथ का प्रमुख शिवलिंग स्थापित है। परिसर में अन्य प्राचीन विग्रहों को भी संरक्षित तरीके से रखा गया है।

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सूर्य नारायण से श्रीराम दरबार तक विराजमान
मंदिर की खासियत यह है कि यहां भगवान शिव के साथ कई अन्य देवी-देवताओं के विग्रह भी स्थापित हैं। परिसर में सूर्य नारायण देव, भगवान गणेश, माता अन्नपूर्णा और श्रीराम दरबार के दर्शन होते हैं। श्रद्धालु भगवान शिव के जलाभिषेक और पूजन के साथ इन देवी-देवताओं की भी आराधना करते हैं।

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द्रौपदी कुंड को लेकर भी पौराणिक मान्यता
मंदिर के समीप स्थित प्राचीन कुंड को द्रौपदी से जोड़कर देखा जाता है। स्थानीय मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान द्रौपदी को प्यास लगी थी। उनकी प्यास बुझाने के लिए अर्जुन ने अपने बाण से भूमि को भेदकर जलधारा प्रकट की थी। इसी कारण इस कुंड को द्रौपदी कुंड कहा जाता है। वर्तमान में इसे अमृत सरोवर के रूप में भी विकसित किया गया है।

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पांच हजार वर्ष से अधिक पुराना होने की मान्यता
स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में मंदिर को पांच हजार वर्ष से भी अधिक पुराना बताया जाता है और इसका संबंध द्वापर युग से जोड़ा जाता है। हालांकि मंदिर की इतनी प्राचीनता का दावा धार्मिक और स्थानीय परंपराओं पर आधारित है। आचार्य रमेश तिवारी के अनुसार, मंदिर का संबंध काशी खंड की परंपरा में भी बताया जाता है।

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सावन और शिवरात्रि में बढ़ जाती है रौनक
सावन में यहां सुबह से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है। भक्त भगवान शिव का जलाभिषेक और पूजन करते हैं। महाशिवरात्रि पर भी विशेष आयोजन होते हैं। वहीं लोटा-भंटा मेले के दौरान मंदिर और आसपास का क्षेत्र धार्मिक गतिविधियों से गुलजार रहता है।

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आस्था, पौराणिक मान्यता और लोक परंपरा का संगम
पांचों शिवाला मंदिर में पांडवों से जुड़ी मान्यता, भगवान शिव की आराधना, द्रौपदी कुंड, प्राचीन विग्रह और लोटा-भंटा मेले की लोक परंपरा एक साथ दिखाई देती है। यही वजह है कि स्थानीय लोगों के साथ दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी यह स्थल विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है। मंदिर का राज्य संरक्षित स्मारक होना इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को और बढ़ाता है।

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