काशी के कण-कण में शिव: 27 करोड़ शिवलिंगों के होने की मान्यता, अनादि शिवनगरी की अद्भुत महिमा

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काशी खंड में वर्णित है करोड़ों शिवलिंगों की महिमा, गंगा की धारा से लेकर गली-गली तक शिव की उपस्थिति में रची-बसी है विश्व की प्राचीनतम जीवंत आध्यात्मिक नगरी

स्कंद पुराण के काशी खंड में 27 करोड़ शिवलिंगों का वर्णन, धार्मिक मान्यता के अनुसार गंगा में समाहित हैं पांच करोड़ से अधिक शिवलिंग

त्रिलोचन महादेव को 'महादेव' नाम की महिमा, गोकर्णेश्वर महादेव को श्रद्धालु मानते हैं बाबा विश्वनाथ का संदेशवाहक

काशी में छप्पन विनायक, योगिनियां और शक्तिपीठ भी धार्मिक विरासत का हिस्सा, प्रभु श्रीराम, सूर्य, चंद्र और ऋषि-मुनियों ने शिवलिंग की स्थापना 

काशी में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास, गली-गली, घर-घर और घाट-घाट पर शिव उपासना की अनवरत परंपरा 

रिपोर्ट : ओमकार नाथ
 
वाराणसी।
"काशी में शिव हैं या शिव में काशी"- यह प्रश्न जितना आध्यात्मिक है, उतना ही इस प्राचीन नगरी की पहचान से जुड़ा हुआ भी है। धर्म और अध्यात्म की राजधानी कही जाने वाली काशी को भगवान शिव की नगरी यूं ही नहीं कहा जाता। यहां की हर गली, हर घाट, हर मंदिर, हर घर और यहां तक कि मां गंगा की अविरल धारा में भी शिव की उपस्थिति मानी जाती है। यही कारण है कि काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि सनातन आस्था का जीवंत स्वरूप मानी जाती है।


काशी की आध्यात्मिक पहचान का सबसे बड़ा आधार यहां के शिवालय हैं। धार्मिक मान्यता है कि काशी में स्थापित प्रत्येक शिवलिंग में स्वयं भगवान शिव का स्वरूप विद्यमान है। यही वजह है कि काशी के किसी भी शिवालय में श्रद्धा से शीश नवाना बाबा विश्वनाथ के ही दर्शन के समान माना जाता है।

त्रिलोचन घाट से जुड़ी है महादेव नाम की मान्यता
काशी के त्रिलोचन क्षेत्र का भगवान शिव से विशेष संबंध बताया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी क्षेत्र में शिव को 'महादेव' नाम की महिमा प्राप्त हुई। त्रिलोचन महादेव मंदिर आज भी काशी के प्रमुख शिव तीर्थों में शामिल है। मान्यता है कि यहां दर्शन-पूजन करने से भक्त को विशेष आध्यात्मिक फल प्राप्त होता है।

काशी खंड में काशी की महिमा का वर्णन करते हुए भगवान शिव के अनेक स्वरूपों और यहां स्थापित शिवलिंगों की महत्ता बताई गई है। यही कारण है कि काशी में एक ओर बाबा विश्वनाथ का ज्योतिर्लिंग श्रद्धा का केंद्र है तो दूसरी ओर सैकड़ों प्राचीन और पौराणिक शिवालय काशी की आध्यात्मिक परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं।

गंगा में समाहित हैं पांच करोड़ से अधिक शिवलिंग
काशी की धार्मिक मान्यताओं में गंगा का स्थान सर्वोपरि है। यहां बहने वाली मां गंगा को स्वयं शिव की जटाओं से निकली पवित्र धारा माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार काशी में बताए गए करोड़ों शिवलिंगों में से पांच करोड़ से अधिक शिवलिंग गंगा में समाहित हैं।

इनमें कुछ शिवलिंग समय-समय पर गंगा का जलस्तर कम होने पर श्रद्धालुओं को दिखाई देते हैं, जबकि जलस्तर बढ़ने के बाद वे फिर गंगा की धारा में अदृश्य हो जाते हैं। श्रद्धालुओं के लिए गंगा की रेत और जल में मिलने वाले ऐसे शिवलिंग भी विशेष आस्था का केंद्र रहे हैं।

हर शिवलिंग में मेरा स्वरूप: काशी खंड
स्कंद पुराण के काशी खंड में भगवान शिव की महिमा का वर्णन करते हुए यह धार्मिक भाव सामने आता है कि शिव अपने भक्तों के लिए अलग-अलग रूपों में विद्यमान हैं। काशी में स्थापित शिवलिंगों को इसी व्यापक शिव स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक मान्यताओं में काशी के अनेक शिवलिंगों को पापनाशक और अकाल मृत्यु से रक्षा करने वाला माना गया है। श्रद्धालु अलग-अलग मनोकामनाओं और धार्मिक संकल्पों के साथ इन प्राचीन शिवालयों में पहुंचते हैं। काशी में ऐसी मान्यताओं से जुड़े हजारों शिवलिंग हैं, जिनकी अपनी अलग कथा और धार्मिक पहचान है।

गोकर्णेश्वर महादेव को कहा जाता है बाबा विश्वनाथ का 'संदेशवाहक'
काशी के कोदई चौकी क्षेत्र स्थित गोकर्णेश्वर महादेव को लेकर भी स्थानीय धार्मिक परंपरा बेहद रोचक है। श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि गोकर्णेश्वर महादेव बाबा विश्वनाथ के संदेशवाहक की भूमिका निभाते हैं। इसी वजह से उन्हें अनौपचारिक रूप से बाबा विश्वनाथ का 'पीआरओ' भी कहा जाता है।

मान्यता है कि भक्त यहां अपनी बात और मनोकामना भगवान शिव के समक्ष रखते हैं और उनकी प्रार्थना बाबा विश्वनाथ तक पहुंचती है। इसी आस्था के कारण गोकर्णेश्वर महादेव मंदिर स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच विशेष महत्व रखता है।

छप्पन विनायक, योगिनियां और देवी मंदिर भी काशी की पहचान
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष नागेंद्र पांडेय के अनुसार, काशी खंड में केवल शिवालयों का ही वर्णन नहीं है, बल्कि काशी की धार्मिक परंपरा में छप्पन विनायक, योगिनियों और विभिन्न देवी मंदिरों का भी विशेष उल्लेख मिलता है।

काशी में अलग-अलग दिशाओं और क्षेत्रों में स्थापित विनायक मंदिरों की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। इसी तरह देवी मंदिर और शक्तिपीठ परंपरा से जुड़े स्थल भी काशी की धार्मिक संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

श्रीराम से लेकर सूर्य और चंद्र तक ने स्थापित किए शिवलिंग
काशी की धार्मिक परंपरा में अनेक देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों द्वारा शिवलिंग स्थापित किए जाने की कथाएं मिलती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम, सूर्य, चंद्रमा और अनेक ऋषि-मुनियों ने भी काशी में शिवलिंग स्थापित किए।

इन्हीं पौराणिक मान्यताओं के कारण काशी के अलग-अलग हिस्सों में स्थित शिवालयों को किसी न किसी देवी-देवता, ऋषि अथवा पौराणिक कथा से जोड़ा जाता है। यही विविधता काशी को दुनिया के अन्य धार्मिक नगरों से अलग पहचान देती है।

घर-घर और गली-गली में शिव की उपस्थिति
सनातन रक्षक दल के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा के अनुसार, काशी खंड में 27 करोड़ शिवलिंगों का वर्णन मिलता है। इनमें कई दृश्य हैं तो अनेक अदृश्य रूप में माने गए हैं। काशी की धार्मिक परंपरा में शिव केवल मंदिरों तक सीमित नहीं हैं।

काशी के पुराने घरों, गलियों, मंदिरों और यहां तक कि दीवारों पर भी शिवलिंग और शिव प्रतीकों की मौजूदगी देखने को मिलती है। छोटी-सी गली में बने किसी छोटे शिवालय से लेकर भव्य मंदिर तक, हर स्थान पर शिव उपासना की अलग परंपरा दिखाई देती है।

33 कोटि देवी-देवताओं की उपस्थिति की मान्यता
काशी को देवताओं की नगरी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां 33 कोटि देवी-देवताओं का वास है। यही वजह है कि काशी में किसी एक देवता की उपासना तक धर्म सीमित नहीं है, बल्कि यहां शिव, शक्ति, विष्णु, सूर्य, गणेश, हनुमान और अनेक देवी-देवताओं की पूजा परंपराएं एक साथ दिखाई देती हैं।

काशी की खासियत यह है कि यहां धार्मिक मान्यताएं केवल मंदिरों की चारदीवारी तक सीमित नहीं हैं। घाटों पर होने वाली आरती, गलियों में गूंजता हर-हर महादेव का जयघोष, घरों में होने वाली शिव पूजा और गंगा तट पर होने वाले अनुष्ठान मिलकर काशी को एक जीवंत आध्यात्मिक नगर का स्वरूप देते हैं।

काशी को कहा जाता है 'शिव की नगरी'
काशी की धार्मिक पहचान को समझने के लिए उसके मंदिरों की संख्या से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसकी परंपराएं और मान्यताएं हैं। यहां बाबा विश्वनाथ को आदि विश्वेश्वर माना जाता है और काशी के प्रत्येक शिवालय को उसी शिव स्वरूप से जोड़ा जाता है।

27 करोड़ शिवलिंगों की धार्मिक मान्यता हो, गंगा में समाहित करोड़ों शिवलिंगों की परंपरा हो, छप्पन विनायक और योगिनियों की उपासना हो या 33 कोटि देवी-देवताओं के काशी में निवास की मान्यता -ये सभी परंपराएं मिलकर काशी को एक ऐसे आध्यात्मिक नगर के रूप में स्थापित करती हैं, जहां शिव केवल मंदिर में नहीं, बल्कि काशी के कण-कण में विराजमान माने जाते हैं।

इसी आस्था के साथ काशी में आज भी हर सुबह 'हर-हर महादेव' का जयघोष गूंजता है और श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के साथ काशी के अनगिनत शिवालयों में भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचते हैं।

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