काल सर्प दोष से मिलती है मुक्ति, काशी में विराजमान हैं शंखचुड़ेश्वर महादेव, नागराज शंखचूड़ ने की थी शिवलिंग की स्थापना 

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काशी खंड में विशेष महत्व का वर्णन, नागराज शंखचूड़ ने की थी शिवलिंग की स्थापना, समय के साथ चंद्रचूड़ेश्वर नाम से भी प्रसिद्ध

दारानगर मैदागिन स्थित महामृत्युंजय मंदिर के पास विराजमान प्राचीन शिवलिंग, दर्शन-पूजन को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष धार्मिक मान्यता

काशी खंड में शंखचुड़ेश्वर महादेव की महिमा का मिलता है उल्लेख, नागराज शंखचूड़ द्वारा शिवलिंग की स्थापना की धार्मिक मान्यता

दर्शन मात्र से काल सर्प से उत्पन्न भय दूर होने की मान्यता, चंद्रचूड़ेश्वर महादेव के नाम से भी जानते हैं श्रद्धालु

सावन, नाग पंचमी और महाशिवरात्रि पर होती है पूजा-अर्चना, दर्शन को उमड़ते हैं श्रद्धालु 

रिपोर्ट - ओमकार नाथ

वाराणसी। काशी के कण-कण में भगवान शिव के अलग-अलग स्वरूप और उनसे जुड़ी प्राचीन धार्मिक मान्यताएं विद्यमान हैं। इन्हीं प्राचीन शिवलिंगों में दारानगर मैदागिन स्थित महामृत्युंजय मंदिर के पास विराजमान शंखचुड़ेश्वर महादेव का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि इनके दर्शन-पूजन से काल सर्प दोष से उत्पन्न भय और बाधाओं से मुक्ति मिलती है। इसी आस्था के चलते काल सर्प दोष से जुड़ी धार्मिक मान्यता रखने वाले श्रद्धालु यहां विशेष श्रद्धा के साथ भगवान शिव का पूजन करते हैं।

काशी खंड में मिलता है विशेष उल्लेख
शंखचुड़ेश्वर महादेव की महिमा का उल्लेख काशी खंड में भी मिलता है। इसमें कहा गया है—
“शंखचुडेश्वरश्चैष शन्खचूडप्रतिष्ठितः।
यस्य सन्दर्शनात्पुंसां न भयं कालसर्पजम्।।”
धार्मिक परंपरा के अनुसार इस शिवलिंग की स्थापना नागराज शंखचूड़ ने की थी। शंखचूड़ द्वारा प्रतिष्ठित किए जाने के कारण भगवान शिव के इस स्वरूप को शंखचुड़ेश्वर नाम मिला। मान्यता है कि इनके दर्शन से काल सर्प से उत्पन्न भय नहीं रहता।

नागराज शंखचूड़ से जुड़ी प्राचीन कथा
पौराणिक परंपरा में शंखचूड़ का उल्लेख नागराज के रूप में मिलता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार पाताल लोक में निवास करने वाले नागों में शंखचूड़ का भी वर्णन मिलता है। इसी नागराज की शिव आराधना और शिवलिंग स्थापना की कथा इस प्राचीन मंदिर से जुड़ी हुई है।

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काशी खंड में इसी क्षेत्र में शंखचूड़ नामक वापी का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि वर्तमान समय में इस प्राचीन वापी का स्पष्ट अस्तित्व या स्थान ज्ञात नहीं है। धार्मिक परंपरा में इसे क्षेत्र के प्राचीन स्वरूप और नाग उपासना से जोड़कर देखा जाता है।

शंखचुड़ेश्वर से चंद्रचूड़ेश्वर तक पहुंचा नाम
समय के साथ स्थानीय उच्चारण और बोलचाल की परंपरा में शंखचुड़ेश्वर महादेव को कई लोग चंद्रचूड़ेश्वर महादेव के नाम से भी जानते हैं। हालांकि धार्मिक ग्रंथों, विशेषकर काशी खंड में इसका प्राचीन नाम शंखचुड़ेश्वर महादेव ही मिलता है। काशी के कई प्राचीन मंदिरों और शिवलिंगों के नाम स्थानीय परंपराओं के चलते अलग-अलग रूपों में प्रचलित हैं।

काल सर्प दोष से मुक्ति की मान्यता
ज्योतिषीय मान्यताओं में काल सर्प दोष को राहु और केतु से जुड़ी स्थिति माना जाता है। धार्मिक आस्था रखने वाले लोग इसके निवारण के लिए विभिन्न शिवालयों में पूजा-अर्चना करते हैं। काशी में शंखचुड़ेश्वर महादेव को भी इस दृष्टि से विशेष धार्मिक स्थल माना जाता है। मान्यता के अनुसार श्रद्धापूर्वक दर्शन, जलाभिषेक और पूजन करने से काल सर्प दोष से संबंधित भय और बाधाएं दूर होती हैं। श्रद्धालु भगवान शिव को जल, बेलपत्र, पुष्प आदि अर्पित कर सुख-शांति और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।

दारानगर मैदागिन क्षेत्र में महामृत्युंजय मंदिर के निकट स्थित होने के कारण श्रद्धालुओं के लिए यहां पहुंचना सहज है। सावन, नाग पंचमी और महाशिवरात्रि जैसे पर्वों पर मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है। काशी की प्राचीन धार्मिक परंपरा में शंखचुड़ेश्वर महादेव आज भी नागराज शंखचूड़ की शिव आराधना और काशी की सनातन शिव उपासना की स्मृति को संजोए हुए हैं।

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