यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हुआ सारनाथ, भारत की सांस्कृतिक विरासत को मिली वैश्विक पहचान 

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वाराणसी। महात्मा बुद्ध की प्रथम धर्मदेशना स्थली और विश्व प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ सारनाथ को यूनेस्को की विश्व धरोहर (वर्ल्ड हेरिटेज) सूची में शामिल कर लिया गया है। यह उपलब्धि भारत की प्राचीन सभ्यता, बौद्ध संस्कृति और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए ऐतिहासिक मानी जा रही है। यूनेस्को की इस मान्यता के साथ ही सारनाथ अब विश्व के उन चुनिंदा ऐतिहासिक स्थलों की श्रेणी में शामिल हो गया है, जिन्हें मानव सभ्यता की अमूल्य धरोहर माना जाता है।

इस उपलब्धि पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि सारनाथ को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाना प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध के जीवन और उनके संदेशों से जुड़ा यह पवित्र स्थल सदियों से पूरी दुनिया को शांति, करुणा, अहिंसा और मानवता का संदेश देता आया है। प्रधानमंत्री ने विश्वास जताया कि यूनेस्को की मान्यता मिलने के बाद दुनिया भर से अधिक संख्या में पर्यटक, शोधकर्ता और बौद्ध श्रद्धालु सारनाथ आएंगे, जिससे भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर और अधिक पहचान मिलेगी।

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सारनाथ से शुरू हुआ धर्मचक्र प्रवर्तन
वाराणसी शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित सारनाथ बौद्ध धर्म के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। बोधगया में ज्ञान प्राप्त करने के बाद महात्मा बुद्ध ने अपने पांच शिष्यों को यहीं पहला उपदेश दिया था, जिसे 'धर्मचक्र प्रवर्तन' कहा जाता है। इसी घटना ने सारनाथ को बौद्ध धर्म के उद्भव और प्रचार का प्रमुख केंद्र बना दिया।

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अशोक ने दिया भव्य स्वरूप
महात्मा बुद्ध के प्रथम उपदेश के लगभग तीन शताब्दियों बाद मौर्य सम्राट अशोक ने सारनाथ का व्यापक विकास कराया। उन्होंने यहां कई महत्वपूर्ण स्मारकों का निर्माण कराया, जिनमें धर्मराजिका स्तूप, धमेख स्तूप और प्रसिद्ध अशोक सिंह स्तंभ प्रमुख हैं। अशोक स्तंभ का सिंह शीर्ष आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है और इसकी धर्मचक्र आकृति राष्ट्रीय ध्वज में भी अंकित है।

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कुषाण और गुप्तकाल में कला का स्वर्णिम केंद्र
अशोक के बाद कुछ समय तक सारनाथ का महत्व कम हुआ, लेकिन पहली शताब्दी ईस्वी में कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल में यहां बौद्ध धर्म का पुनः विस्तार हुआ। इस दौरान अनेक विहारों, स्तूपों और बोधिसत्व प्रतिमाओं का निर्माण कराया गया।

गुप्तकाल को सारनाथ का स्वर्णिम युग माना जाता है। उस समय यह मथुरा के साथ उत्तर भारत में बौद्ध कला और मूर्तिकला का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। सारनाथ शैली की बुद्ध प्रतिमाएं आज भी भारतीय मूर्तिकला की उत्कृष्ट कृतियों में गिनी जाती हैं और विश्वभर के संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं।

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ह्वेनसांग ने भी किया था उल्लेख
सातवीं शताब्दी में भारत आए प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा-वृत्तांत में सारनाथ का विस्तृत वर्णन किया है। उन्होंने इसे विशाल, समृद्ध और बौद्ध धर्म का प्रमुख शिक्षण एवं धार्मिक केंद्र बताया। उनके विवरण से उस समय सारनाथ की भव्यता और समृद्धि का अनुमान लगाया जाता है।

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आक्रमणों में हुआ नुकसान, फिर हुआ पुनरुद्धार
11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी के वाराणसी आक्रमण के दौरान सारनाथ को भारी क्षति पहुंची। इसके बाद पाल वंश और गाहड़वाल शासकों ने इसके पुनरुद्धार का प्रयास किया। गाहड़वाल शासक गोविंदचंद्र की रानी कुमार देवी द्वारा यहां विहार निर्माण कराए जाने के प्रमाण उत्खननों में प्राप्त अभिलेखों से मिले हैं।

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पुरातात्विक उत्खननों ने खोले इतिहास के द्वार
सारनाथ का पहला सीमित उत्खनन 1815 में कर्नल मैकेंज़ी ने कराया, हालांकि विशेष सफलता नहीं मिली। इसके बाद 1835-36 में प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद अलेक्जेंडर कनिंघम ने व्यापक खुदाई कराई, जिसमें धमेख स्तूप, चौखंडी स्तूप और मध्यकालीन विहारों के अवशेष मिले।

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1851-52 में मेजर किटोई के उत्खनन में कई स्तूप और विहार सामने आए। बाद में एडवर्ड थॉमस और प्रो. फिट्ज एडवर्ड हार्न ने भी अनुसंधान कार्य को आगे बढ़ाया। इन उत्खननों से प्राप्त अधिकांश पुरावशेष वर्तमान में भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में सुरक्षित हैं।

सारनाथ का पहला वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित उत्खनन एच.बी. ओरटल के निर्देशन में किया गया। इसमें मुख्य मंदिर, अशोक स्तंभ, बोधिसत्व की विशाल प्रतिमा, बुद्ध की आसनस्थ प्रतिमा, अवलोकितेश्वर, मंजुश्री, तारा और वसुंधरा की दुर्लभ प्रतिमाएं तथा अनेक महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त हुए।

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1907 में पुरातत्त्व विभाग के महानिदेशक जॉन मार्शल ने स्टेनकोनो और दयाराम साहनी के सहयोग से विस्तृत उत्खनन कराया। इसमें कुषाणकालीन मठ, छोटे स्तूप, मंदिर और कुमारदेवी से संबंधित अभिलेखयुक्त प्रतिमाएं मिलीं। 1914-15 में एच. हारग्रीव्स तथा बाद में दयाराम साहनी के नेतृत्व में हुए उत्खननों में मौर्यकाल से लेकर मध्यकाल तक की अनेक संरचनाएं और प्राचीन जल निकासी व्यवस्था भी सामने आई।

विश्वभर के श्रद्धालुओं का प्रमुख केंद्र
आज सारनाथ बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल है। यहां स्थित धमेख स्तूप, चौखंडी स्तूप, अशोक स्तंभ अवशेष, मूलगंध कुटी विहार और पुरातत्व संग्रहालय देश-विदेश से आने वाले लाखों पर्यटकों, शोधार्थियों और बौद्ध श्रद्धालुओं के प्रमुख आकर्षण हैं।

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यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के बाद सारनाथ की वैश्विक पहचान और मजबूत होगी। इससे न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, बौद्ध अध्ययन और स्थानीय पर्यटन अर्थव्यवस्था को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।

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