क्षेत्रीय भाषाओं ने थामी राष्ट्र की डोर, भारत के निर्माण में निभाई बड़ी भूमिका : डॉ. नीलकंठ तिवारी
वाराणसी। काशी केवल धार्मिक नगरी नहीं, बल्कि ज्ञान और आध्यात्मिक चिंतन की विश्व की विशिष्ट भूमि है। प्रयाग, अयोध्या और मथुरा भक्ति से जुड़ी धार्मिक नगरियां हैं, लेकिन ज्ञान की प्राप्ति करनी है तो काशी से बेहतर कोई स्थान नहीं हो सकता। यह बातें रविवार को महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन पीठ सभागार में हिन्दुस्थान समाचार की ओर से आयोजित भारतीय भाषा समागम-2026 में विशिष्ट अतिथि विधायक एवं पूर्व मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी ने कहीं।
डॉ. तिवारी ने कहा कि इतने विद्वानों के बीच इस मंच से बोलते हुए वह स्वयं को एक भिक्षुक की तरह महसूस कर रहे हैं, क्योंकि यहां आने वाला व्यक्ति ज्ञान लेकर जाता है। हिन्दुस्थान समाचार परिवार और अरविंद जी जिस तरह शोध और खोज के बाद विषयों को सामने लाते हैं, उससे उन्हें सुनने और समझने की स्वाभाविक जिज्ञासा पैदा होती है।
काशी में शंकराचार्य को भी मिली ज्ञान की पूर्णता
काशी की ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए डॉ. नीलकंठ तिवारी ने आदि शंकराचार्य से जुड़ा प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि काशी में ज्ञान की परंपरा केवल पुस्तकों और शास्त्रों तक सीमित नहीं रही है। यहां प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर को देखने की दृष्टि विकसित हुई है।
उन्होंने शंकराचार्य और स्वच्छता कर्मी से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जब शंकराचार्य को यह स्मरण कराया गया कि सभी के भीतर एक ही ईश्वर का वास है तो उन्होंने उस व्यक्ति में साक्षात भगवान के दर्शन किए। काशी की भूमि पर शंकराचार्य को भी ज्ञान की पूर्णता प्राप्त हुई।
काशी की गलियों की सफाई भी आध्यात्मिक चिंतन
डॉ. तिवारी ने काशी में चलाए जा रहे अपने स्वच्छता अभियान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वह पिछले 57 दिनों से काशी की गलियों में झाड़ू लेकर निकल रहे हैं। कई लोग उनसे पूछते हैं कि वह प्रतिदिन ऐसा क्यों करते हैं।
उन्होंने कहा कि काशी की गलियों में घूमना भी देव पूजा, आध्यात्मिक चिंतन और दर्शन का हिस्सा है। काशी में तीन अंतरगृह की परिक्रमा होती है और ये परिक्रमाएं यहां की गलियों से होकर गुजरती हैं। ऐसे में काशी की गलियों को स्वच्छ रखना भी आध्यात्मिक चिंतन और पुण्य का कार्य है।

संस्कृत के साथ क्षेत्रीय भाषाओं ने ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाया
संस्कृत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए डॉ. तिवारी ने कहा कि संस्कृत को विश्व की प्राचीनतम लिखित भाषाओं में माना जाता है। उन्होंने ऋग्वेद के प्रथम सूक्त का उदाहरण देते हुए संस्कृत की प्राचीनता और उसमें निहित ज्ञान परंपरा को रेखांकित किया।
इसके साथ ही उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं के योगदान को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि रामायण और रामचरितमानस इसका बड़ा उदाहरण हैं। रामायण की ज्ञान और भक्ति परंपरा को गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी में रामचरितमानस के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाया। इसी तरह सूरदास सहित अनेक संत कवियों ने लोक और क्षेत्रीय भाषाओं में रचनाएं कर समाज को जोड़ने का काम किया।
उन्होंने कहा कि संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को स्थान दिया गया है, जबकि देश में हजारों बोलियां प्रचलित हैं। यही भाषाई विविधता भारत की बड़ी ताकत है।
क्षेत्रीय भाषाओं ने भारत को एक सूत्र में बांधा
डॉ. नीलकंठ तिवारी ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं ने केवल भारतीय साहित्य को समृद्ध नहीं किया, बल्कि भारत की समृद्धि, रक्षा, राष्ट्रीय स्वरूप और राष्ट्रीयता के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उन्होंने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों की भाषाओं और बोलियों ने भारत की विशाल विविधता को एक सूत्र में बांधने का काम किया। भाषा ने अलग-अलग भूभाग, परंपराओं और समाज को जोड़ते हुए राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया है। भारतीय भाषाओं की यही शक्ति देश की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता का महत्वपूर्ण आधार रही है।

