Ramnagar ki Ramlila: जनकपुर से विदा हुईं जानकी तो छलक उठीं आंखें, माता सुनैना और जनक के वात्सल्य-वियोग ने लीलाप्रेमियों को किया भावविभोर

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अवध में छाया उल्सास, गूंजे मंगलगीत, रामनगर की रामलीला में सीता विदाई और अवध आगमन के प्रसंग का मार्मिक मंचन

चारों भाइयों ने जनकपुर में मां सुनैना से मांगी विदाई, पुत्रियों को पालकी में बैठाते समय छलका जनक का वात्सल्य

राम-सीता के अयोध्या पहुंचते ही उत्सव में बदल गया जनकपुर का करुण वातावरण, माता कौशल्या ने प्रेमपूर्वक पूछे विवाह के प्रसंग, राम ने बताया मातृ आशीर्वाद का प्रभाव

गुरु विश्वामित्र की विदाई के साथ हुआ लीला का विश्राम, कौशल्या ने उतारी आठ स्वरूपों की आरती

वाराणसी। रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला के सातवें दिन गुरुवार को जनकपुर की गलियों में जहां विदाई की करुणा पसरी, वहीं अयोध्या में राम-सीता के आगमन ने उल्लास के दीप जला दिए। श्रीराम और माता सीता के विवाह के बाद विदाई और अयोध्या आगमन का प्रसंग ऐसा जीवंत हुआ कि लीलाप्रेमियों की आंखें नम हो उठीं। एक ओर बेटी को विदा करने का दर्द था तो दूसरी ओर नववधुओं के स्वागत की उमंग। भाव, भक्ति और लोकजीवन के रंगों से सजे इस प्रसंग ने रामनगर की रामलीला को एक बार फिर जीवन के शाश्वत सत्य से जोड़ दिया।

लीला का आरंभ गोस्वामी तुलसीदास की चौपाइयों और सोरठा के गायन से हुआ। “निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो...” के माध्यम से श्रीराम के यश की महिमा का गान हुआ। कथा में यह भाव उभरा कि रामचरित का कोई पार नहीं और जो श्रद्धा से राम-सीता के विवाह के मंगल प्रसंग को सुनता-गाता है, उसके जीवन में सुख और मंगल का संचार होता है।

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विदाई की बेला में छलका वात्सल्य
विवाह के बाद चारों भाई जब माता सुनैना से विदा मांगने पहुंचे तो जनकपुर का वातावरण भावुक हो उठा। मां सुनैना का हृदय पुत्रियों के बिछोह की कल्पना से व्याकुल हो गया। राम के मधुर और विनम्र वचनों ने उनके मन को कुछ शांति दी। महाराज जनक ने सीता, मांडवी, उर्मिला और श्रुतकीर्ति को पालकियों में बैठाया। बेटियों को विदा करते समय जनक के चेहरे पर पिता के वात्सल्य और वियोग का भाव स्पष्ट दिखाई दिया। “राम बिदा मांगत कर जोरी, किन्ह प्रनामू बहोरी बहोरी...” जैसे प्रसंगों ने लीला में करुण रस को और गहरा कर दिया।

जनकपुर में विरह, अयोध्या में उत्सव
सीता सहित चारों नववधुओं की विदाई के साथ जनकपुर मानो सूना हो गया। लेकिन जैसे-जैसे राम की बारात अयोध्या की ओर बढ़ी, वातावरण का रंग बदलने लगा। अयोध्यावासी अपने राम और नई बहुओं के स्वागत को आतुर थे। राम, सीता और चारों राजकुमारों को नववधुओं के साथ देखकर अयोध्या आनंद से झूम उठी। राजमहल में पहुंचने पर दशरथ और तीनों माताओं ने राजकुमारों और बहुओं का प्रेमपूर्वक स्वागत किया। मंगलगीतों और हर्षोल्लास से अयोध्या राममय हो उठी।

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मां कौशल्या के प्रश्नों का राम ने दिया विनम्र उत्तर
विश्राम के दौरान माता कौशल्या ने श्रीराम से विवाह और जनकपुर में हुए सभी प्रसंगों के बारे में पूछा। राम ने अपनी सहज विनम्रता से कहा कि जो कुछ हुआ, वह माता के चरणों के प्रभाव और आशीर्वाद से ही संभव हुआ है। आगे भी सभी कार्य उन्हीं के आशीर्वाद से संपन्न होंगे। राम के इन शब्दों में पुत्र का मातृभक्ति भाव स्पष्ट दिखाई दिया।

विश्वामित्र की विदाई से लीला को विराम
प्रभात होते ही महाराज दशरथ और चारों राजकुमारों ने गुरु विश्वामित्र को सम्मानपूर्वक विदा किया। गुरु के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा के भाव के साथ सातवें दिन की लीला का विश्राम हुआ। अंत में माता कौशल्या ने भगवान राम, माता सीता सहित सभी आठ स्वरूपों की आरती उतारी। आरती के दौरान “जय जय श्री सीताराम” के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। रामनगर की रामलीला के इस प्रसंग ने एक बार फिर दिखाया कि रामकथा में जहां बेटी की विदाई का दर्द है, वहीं नए रिश्तों के आगमन का उल्लास भी—और इन्हीं दोनों भावों के बीच जीवन की सुंदर कथा प्रवाहित होती है।

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