Ramnagar ki Ramlila: राम-लक्ष्मण के रूप पर रीझीं जनकपुर की युवतियां, अष्ट सखी संवाद में छलका अनुराग, सीता-राम के प्रथम मिलन ने बांधा भक्ति और श्रृंगार का अद्भुत सेतु
वाराणसी। रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला के चौथे दिन सोमवार की शाम जैसे जनकपुर की धरती पर स्वयं त्रेतायुग उतर आया। फुलवारी यानी पुष्प वाटिका में खिले फूलों के बीच जब गुरु की आज्ञा से राम और लक्ष्मण पहुंचे तो उनकी छवि पर जनकपुर की युवतियों की निगाहें ठहर गईं। प्रकृति की सुषमा के बीच राम का श्यामल रूप और लक्ष्मण का तेज ऐसा था कि सखियों के मुख से बरबस प्रशंसा के स्वर फूट पड़े। मानो फूलों की वाटिका में उस दिन सौंदर्य ने स्वयं अपना परिचय पाया हो।
रामनगर की रामलीला की यही विशेषता है कि यहां कथा केवल मंच पर घटित नहीं होती, बल्कि वातावरण में उतरकर दर्शकों की अनुभूति बन जाती है। तुलसीदास की चौपाइयों में जिस कोमलता से राम और सीता के प्रथम मिलन की कथा कही गई है, सोमवार की लीला में वही भाव साकार दिखाई दिया।
सखियों के संवाद में छलका अनुराग
जनकपुर की युवतियों के बीच हुआ अष्ट सखी संवाद लीला का विशेष आकर्षण रहा। राम-लक्ष्मण के रूप और सौंदर्य का वर्णन करते हुए सखियां कभी उन्हें देवताओं से भी सुंदर बतातीं तो कभी मन ही मन सीता के भावी वर के रूप में देखने लगतीं। उनके संवादों में कौतूहल भी था, कौतुक भी और भविष्य की एक मधुर आहट भी। किसी सखी ने कहा कि इन दोनों राजकुमारों के आने से जनकपुर का सौभाग्य बढ़ गया है तो किसी ने उनके रूप में स्वयं विधाता की अनुपम रचना देखी। इसी भाव को एक सखी ने बड़ी सहजता से कहा- “सिया सोने की अंगूठी, राम सांवरो नगीना हैं।” यह पंक्ति जैसे पूरे प्रसंग का भाव-सार बन गई।

फूलों के बीच हुआ प्रथम मिलन
इसके बाद पुष्प वाटिका का वह मनोहारी प्रसंग आया, जिसका दर्शकों को बेसब्री से इंतजार था। फूल चुनने पहुंचीं माता सीता की नजर जब श्रीराम पर पड़ी तो क्षण भर के लिए समय जैसे ठहर गया। शब्द मौन थे, लेकिन आंखों में संवाद था। यह प्रथम मिलन प्रेम की उस मर्यादित अनुभूति का प्रतीक बना, जिसमें भाव मुखर होने से पहले ही हृदय की भाषा बन जाते हैं। फुलवारी के फूल, मंद वातावरण और राम-सीता की एक-दूसरे पर ठहरी दृष्टि ने दृश्य को इतना जीवंत कर दिया कि दर्शक कुछ पल के लिए लीला देखने वाले नहीं, बल्कि उसके सहभागी प्रतीत हुए। पुष्प वाटिका में उस शाम फूल ही नहीं खिले, प्रेम का पहला भाव भी खिल उठा।

गौरी पूजन में मांगा राम जैसा वर
इसके बाद सीता जी के गौरी पूजन का प्रसंग हुआ। माता गौरी के समक्ष सीता ने मन ही मन श्रीराम को वर के रूप में पाने की कामना की। आकाशवाणी के माध्यम से उन्हें मनोवांछित वर मिलने का आशीर्वाद मिला। इस प्रसंग के साथ सखियां सीता को लेकर महल लौट गईं और राम-लक्ष्मण गुरु के आश्रम की ओर चले गए। आरती के साथ चतुर्थ दिवस की लीला का विश्राम हुआ। संत ने भगवान की आरती उतारी तो पूरा वातावरण भक्ति में डूब गया।

