Ramnagar ki Ramlila : विभीषण की शरणागति से रामेश्वर स्थापना तक, रामनगर की रामलीला में दिखी भक्ति और मर्यादा की अनुपम छटा
रावण ने ठुकराई विभीषण की सीख, श्रीराम ने शत्रु के भाई को भी दिया सम्मान और बनाया लंकेश
तीन दिन की प्रतीक्षा के बाद प्रकट हुए समुद्र देव, नल-नील के नेतृत्व में शुरू हुआ सेतु निर्माण
बीसवें दिन समुद्र तट पर गूंजे श्रीराम के जयकारे, सेतु निर्माण के साथ लंका विजय की ओर बढ़े प्रभु श्रीराम
वाराणसी। रामनगर की विश्वविख्यात रामलीला के बीसवें दिन बुधवार को विभीषण शरणागति, सेतु निर्माण और रामेश्वर स्थापना की लीला ने श्रद्धालुओं को भक्ति, नीति, विनम्रता और धर्म की विजय का संदेश दिया। प्रसंगों के मंचन में कहीं रावण के अहंकार की झलक दिखाई दी तो कहीं प्रभु श्रीराम की करुणा और शरणागत वत्सलता ने भक्तों को भावविभोर कर दिया। समुद्र तट पर सेतु निर्माण और शिवलिंग स्थापना के साथ लीला का विश्राम हुआ। इस दौरान राम नाम के जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठा।
विभीषण की नीति रावण के अहंकार के आगे हारी
लीला का आरंभ उस प्रसंग से हुआ, जब भगवान श्रीराम वानर और भालुओं की सेना के साथ समुद्र के इस पार पहुंचते हैं। राम की सेना के आगमन का समाचार सुनकर मंदोदरी रावण को समझाती हैं, लेकिन अहंकार में डूबा रावण उनकी बातों को हंसी में उड़ा देता है। इसके बाद राजदरबार में मंत्रियों की सभा बुलाकर युद्ध की रणनीति पर चर्चा होती है। वानर सेना को तुच्छ समझने वाले रावण के दरबार में जब विभीषण नीति और विवेक की बात रखते हैं, तो उनकी सलाह स्वीकार करने के बजाय रावण उनका अपमान कर लंका से निष्कासित कर देता है।
विभीषण के प्रस्थान के साथ ही लंका के विनाश की भूमिका स्पष्ट होने लगती है। भाई और राज्य का मोह त्यागकर विभीषण प्रभु श्रीराम की शरण में पहुंचते हैं। हनुमान और अंगद उन्हें प्रभु के समक्ष ले जाते हैं। श्रीराम उनका आत्मीयता से स्वागत करते हुए उन्हें 'लंकेश' कहकर संबोधित करते हैं और समुद्र के जल से उनका राज्याभिषेक कर देते हैं। यह प्रसंग संदेश देता है कि प्रभु के दरबार में कुल, पद और अतीत से अधिक महत्व सत्य, नीति और शरणागत के सम्मान का है।
तीन दिन की प्रतीक्षा, फिर समुद्र पर श्रीराम का कोप
समुद्र पार करने का उपाय पूछने पर विभीषण श्रीराम को समुद्र देवता की आराधना करने की सलाह देते हैं। इसी बीच रावण के भेजे दूत शुक और सारण वानर सेना की जासूसी करते पकड़े जाते हैं। उन्हें चेतावनी देकर लक्ष्मण एक पत्र के साथ रावण के पास भेजते हैं, जिसमें सीता को सम्मानपूर्वक लौटाने का संदेश रहता है। रावण फिर भी अपनी जिद नहीं छोड़ता। उधर तीन दिन तक समुद्र देवता के प्रकट न होने पर श्रीराम क्रोधित हो उठते हैं। वे बाण उठाते हैं, तभी समुद्र देवता प्रकट होकर विनय करते हैं। स्वयं को जड़ बताते हुए वे समुद्र पर सेतु बनाने का उपाय सुझाते हैं और नल-नील की विशेषता बताते हैं।
रामेश्वरम स्थापना के साथ सेतु निर्माण पूर्ण
नल-नील के नेतृत्व में वानर सेना समुद्र पर सेतु बनाने में जुट जाती है। इसी दौरान श्रीराम समुद्र तट पर शिवलिंग की स्थापना कर उसका नाम रामेश्वर रखते हैं और भगवान शिव की महिमा का वर्णन करते हैं। सेतु निर्माण पूरा होने पर रामभक्तों के जयकारों से वातावरण गूंज उठता है। इस दिन की आरती विभीषण ने की। लीला ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि अहंकार विनाश की ओर ले जाता है, जबकि विनम्रता, विवेक और प्रभु के प्रति समर्पण कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

