बीएचयू आयुर्वेद संकाय में प्रोफेसर पदोन्नति नियम पर उठे सवाल, राष्ट्रीय आयोग ने डीएसीपी व्यवस्था खत्म करने के दिए निर्देश
वाराणसी। बीएचयू के आयुर्वेद संकाय में प्रोफेसर पद पर पदोन्नति के लिए लागू की गई डीएसीपी (डायनेमिक एश्योर्ड करियर प्रोग्रेशन) व्यवस्था को लेकर विवाद गहरा गया है। भारतीय चिकित्सा पद्धति राष्ट्रीय आयोग (एनसीआईएसएम) ने इस व्यवस्था को आयुष मंत्रालय और आयोग द्वारा निर्धारित नियमों के विपरीत बताते हुए गंभीर आपत्ति दर्ज की है। आयोग ने विश्वविद्यालय प्रशासन को तत्काल प्रभाव से इस व्यवस्था को निरस्त करने तथा पदोन्नति प्रक्रिया को निर्धारित मानकों के अनुरूप संचालित करने के निर्देश दिए हैं।
मामला उस समय सामने आया जब राष्ट्रीय आयोग के रेटिंग बोर्ड के अध्यक्ष प्रो. मुकुल पटेल को आयुर्वेद संकाय में प्रोफेसर पदोन्नति से संबंधित एक शिकायत प्राप्त हुई। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि संकाय में प्रोफेसर पद पर पदोन्नति के लिए आयोग द्वारा निर्धारित न्यूनतम शैक्षणिक अनुभव की अनदेखी की जा रही है। शिकायत मिलने के बाद आयोग ने उपलब्ध अभिलेखों और नियमों की समीक्षा की तथा मामले को गंभीर मानते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन से स्पष्टीकरण मांगा।
आयोग ने अपने निर्देश में स्पष्ट किया है कि एनसीआईएसएम रेगुलेशन-17 के तहत किसी भी आयुर्वेद शिक्षण संस्थान में प्रोफेसर पद के लिए न्यूनतम 10 वर्ष का नियमित शिक्षण अनुभव अनिवार्य है। निर्धारित मानकों के अनुसार उम्मीदवार के पास या तो 10 वर्ष तक सहायक प्राध्यापक (असिस्टेंट प्रोफेसर) के रूप में कार्य करने का अनुभव होना चाहिए, अथवा पांच वर्ष सहायक प्राध्यापक और पांच वर्ष एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में सेवाएं देने का अनुभव आवश्यक है। आयोग का कहना है कि इससे कम अनुभव रखने वाले शिक्षकों को प्रोफेसर पद के लिए पात्र नहीं माना जा सकता।
विवाद का मुख्य कारण आयुर्वेद संकाय में लागू डीएसीपी योजना को माना जा रहा है। आरोप है कि इस व्यवस्था के तहत मात्र नौ वर्ष के अनुभव के आधार पर प्रोफेसर पद पर पदोन्नति का प्रावधान किया गया था। आयोग का मानना है कि यह व्यवस्था आयुष मंत्रालय और एनसीआईएसएम द्वारा निर्धारित नियमों से मेल नहीं खाती, इसलिए इसे मान्यता नहीं दी जा सकती।
सूत्रों के अनुसार, इस मुद्दे को लेकर संकाय के भीतर लंबे समय से असंतोष का माहौल बना हुआ था। कई शिक्षकों ने समय-समय पर इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई थी। कुछ शिक्षकों का आरोप था कि पदोन्नति के मानकों में बदलाव कर कुछ व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने का प्रयास किया गया। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस संबंध में कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की है।
राष्ट्रीय आयोग के निर्देशों के बाद अब बीएचयू प्रशासन के सामने डीएसीपी व्यवस्था की समीक्षा कर उसे राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप संशोधित करने की चुनौती है। शिक्षा और आयुर्वेद क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि नियामक संस्था के निर्देशों का पालन करना विश्वविद्यालय के लिए आवश्यक है। यदि निर्धारित मानकों की अनदेखी की जाती है तो इससे संस्थान की शैक्षणिक साख, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और भविष्य की मान्यताओं पर असर पड़ सकता है।
फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। आयोग की सख्ती के बाद अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि बीएचयू इस मामले में क्या कदम उठाता है और पदोन्नति संबंधी नियमों में किस प्रकार का संशोधन करता है।

