लमही में गूंजा प्रेमचंद का साहित्य, 146वीं जयंती पर डीएम ने अर्पित की पुष्पांजलि
वाराणसी। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती पर शुक्रवार को उनके पैतृक गांव लमही में साहित्य और संस्कृति का संगम देखने को मिला। संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश और जिला प्रशासन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘लमही महोत्सव’ में प्रेमचंद की रचनाओं और उनके सामाजिक सरोकारों को विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से जीवंत किया गया। इस अवसर पर एमएलसी धर्मेंद्र सिंह और जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने प्रेमचंद स्मारक पहुंचकर उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की।
एमएलसी धर्मेंद्र सिंह ने कहा कि प्रेमचंद ने काल्पनिक दुनिया के बजाय वास्तविक जीवन को अपनी रचनाओं का आधार बनाया। उन्होंने किसानों की गरीबी, जमींदारी व्यवस्था, जातीय भेदभाव, महिलाओं की स्थिति, भ्रष्टाचार, शोषण और सामाजिक कुरीतियों को साहित्य में प्रभावी ढंग से उठाया। उनकी भाषा सहज और आम बोलचाल की रही, जिसके कारण उनकी रचनाएं समाज के हर वर्ग तक पहुंचीं। उनकी कहानियां मनोरंजन के साथ समाज को आत्ममंथन और बदलाव की प्रेरणा भी देती हैं।

जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने कहा कि बचपन में हम सभी ने ‘ईदगाह’ कहानी पढ़ी है और दादी व हामिद के भावनात्मक रिश्ते को महसूस किया है। उन्होंने बताया कि किस प्रकार हामिद मेले से अपनी दादी के लिए चिमटा लेकर आता है। डीएम ने प्रेमचंद की चर्चित कहानी ‘कफन’ का भी उल्लेख करते हुए कहा कि प्रेमचंद ने समाज की वास्तविकताओं को जिस प्रभावशाली तरीके से अपनी रचनाओं में पिरोया, वह अद्वितीय है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत कुछ छोड़ गए हैं।
डीएम ने बताया कि उन्हें नागरी प्रचारिणी सभा जाने का अवसर मिला, जहां प्रेमचंद के जीवन से जुड़े कई पहलुओं की जानकारी मिली। उन्होंने कहा कि लमही में प्रेमचंद को प्रारंभिक शिक्षा एक मौलवी से मिली थी। उन्होंने बीएचयू के कुलपति से बातचीत कर लमही स्थित संग्रहालय और अन्य कार्यों को आगे बढ़ाने का प्रयास करने की बात कही। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद सभी के लिए प्रेरणास्रोत हैं और बच्चों को उनके साहित्य व जीवन से परिचित कराने के लिए एक बार लमही अवश्य लाना चाहिए।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और प्रेमचंद की प्रतिमा पर माल्यार्पण से हुआ। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र के प्रभारी डॉ. राम नरेश पाल ने अतिथियों का स्वागत किया। साहित्यकारों और विद्वानों को स्मृति चिह्न एवं अंगवस्त्र देकर सम्मानित किया गया। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में ‘पागल हाथी’, ‘बड़े घर की बेटी’, ‘कफन’, ‘ईदगाह’, ‘पंच परमेश्वर’ और ‘मंत्र’ जैसी रचनाओं पर आधारित कहानी-पाठ एवं नाट्य प्रस्तुतियां हुईं। विभिन्न विद्यालयों के बच्चों ने प्रभावशाली मंचन कर प्रेमचंद के पात्रों और कथानकों को जीवंत कर दिया। निर्गुण और लोक गायन के साथ काव्य-पाठ भी हुआ। शाम को प्रेमचंद स्मारक और पैतृक आवास को दीपों से सजाया गया। कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति और शिक्षा जगत की हस्तियों के साथ बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी एवं स्थानीय नागरिक मौजूद रहे।

