21 साल बाद नए कलेवर में दिखेगी प्रेमचंद की जन्मस्थली, 31 जुलाई तक लमही स्मारक परिसर होगा तैयार

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वाराणसी। हिंदी और उर्दू साहित्य के महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की जन्मस्थली लमही अब लंबे इंतजार के बाद नए स्वरूप में दिखाई देने वाली है। करीब 21 वर्षों बाद प्रेमचंद स्मारक परिसर, उनका पैतृक आवास और आसपास का क्षेत्र व्यापक कायाकल्प से गुजर रहा है। 31 जुलाई को मुंशी प्रेमचंद की जयंती से पहले स्मारक स्थल को नए रूप में तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है, ताकि देश-विदेश से आने वाले साहित्यकारों, शोधार्थियों और पर्यटकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। इस परियोजना का उद्देश्य केवल स्मारक का सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि लमही को साहित्य, शोध और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करना भी है।

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उत्तर प्रदेश सरकार ने इस परियोजना के लिए लगभग पांच करोड़ रुपये स्वीकृत किए हैं। उत्तर प्रदेश प्रोजेक्ट कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) के माध्यम से स्मारक परिसर, प्रेमचंद के पैतृक आवास, पुस्तकालय, प्रेमचंद सरोवर और पूरे परिसर के सुंदरीकरण का कार्य कराया जा रहा है। पिछले तीन महीनों से निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है और अधिकांश हिस्सों में काम अंतिम चरण में पहुंच चुका है।

परियोजना के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिषेक सोलंकी के अनुसार अब तक करीब 70 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। स्मारक स्थल के चबूतरे और दीवारों को चुनार के पत्थरों से नया स्वरूप दिया जा रहा है। वहीं प्रेमचंद के पैतृक आवास की मरम्मत इस प्रकार की जा रही है कि उसकी मूल ऐतिहासिक पहचान बनी रहे और भवन लंबे समय तक सुरक्षित रह सके।

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बरसात के मौसम में परिसर में जलभराव की पुरानी समस्या को भी इस परियोजना में दूर किया जा रहा है। इसके लिए नई जल निकासी व्यवस्था विकसित की गई है। नालियों को सीवर लाइन से जोड़ दिया गया है, जिससे वर्षा का पानी अब परिसर में जमा होने के बजाय सीधे निकासी व्यवस्था में चला जाएगा।

स्मारक के सामने आधुनिक सुविधाओं से युक्त एक लाइब्रेरी भी विकसित की जा रही है। यहां मुंशी प्रेमचंद के साहित्य के साथ हिंदी और उर्दू साहित्य से जुड़ी महत्वपूर्ण पुस्तकें, दस्तावेज और शोध सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी। अधिकारियों का कहना है कि यह पुस्तकालय भविष्य में शोधार्थियों और साहित्य प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा। हालांकि लाइब्रेरी और बीएचयू द्वारा संचालित भवन का निर्माण कार्य पूरा होने में अभी दो से तीन महीने का समय लग सकता है।

परियोजना के अंतर्गत प्रेमचंद सरोवर का भी व्यापक सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। सरोवर के चारों ओर चुनार के पत्थरों से सीढ़ियां बनाई जा रही हैं, जबकि आगंतुकों के बैठने के लिए आकर्षक पत्थर की बेंचें स्थापित की जा रही हैं। इसका उद्देश्य ऐसा शांत और व्यवस्थित वातावरण तैयार करना है, जहां साहित्य प्रेमी प्रकृति के बीच समय बिता सकें।

हालांकि, स्मारक परिसर का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन जयंती से पहले कुछ मूलभूत समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। प्रेमचंद के पैतृक आवास तक जाने वाली सड़क जगह-जगह क्षतिग्रस्त है, जिससे आगंतुकों को आने-जाने में परेशानी होती है। इसके अलावा प्रेमचंद सरोवर के आसपास सफाई व्यवस्था भी संतोषजनक नहीं है। लमही के पूर्व प्रधान संतोष पटेल का कहना है कि नगर निगम से कई बार शिकायत करने के बावजूद सड़क मरम्मत और सफाई को लेकर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई है। स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि इन समस्याओं का शीघ्र समाधान नहीं हुआ तो जयंती समारोह में आने वाले देश-विदेश के अतिथियों पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

इस बीच बीएचयू द्वारा संचालित मुंशी प्रेमचंद शोध संस्थान भी चर्चा का विषय बना हुआ है। संस्थान के भवन में अधिकांश समय ताला बंद रहने के कारण वहां प्रस्तावित नवीनीकरण कार्य शुरू नहीं हो सका है। परियोजना प्रबंधन ने बीएचयू से अनुमति मांगी है और शासन स्तर पर भी पत्र भेजकर आवश्यक निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह संस्थान वर्ष में केवल प्रेमचंद जयंती के अवसर पर ही खुलता है, जबकि यहां ऑडिटोरियम, पुस्तकालय और संग्रहालय जैसी महत्वपूर्ण सुविधाएं मौजूद हैं।

साहित्यकारों और स्थानीय नागरिकों का मानना है कि यदि स्मारक परिसर के साथ शोध संस्थान, पुस्तकालय और संग्रहालय का नियमित संचालन सुनिश्चित किया जाए तथा सड़क, सफाई और अन्य बुनियादी सुविधाओं में सुधार हो, तो लमही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है। इससे न केवल प्रेमचंद की साहित्यिक विरासत को नई पहचान मिलेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार और पर्यटन की संभावनाओं को भी नया विस्तार मिलेगा।

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