सावन के पहले सोमवार को यादव बंधुओं ने काशी विश्वनाथ समेत पांच शिवालयों में किया जलाभिषेक, सदियों पुरानी परंपरा निभाई, गूंजा डमरुओं के निनाद और हर-हर महादेव का उद्घोष
वाराणसी। सावन के प्रथम सोमवार पर शिव की नगरी काशी एक बार फिर आस्था, परंपरा और भक्ति के रंग में रंगी नजर आई। जहां एक ओर लाखों श्रद्धालुओं ने श्री काशी विश्वनाथ धाम में बाबा के दर्शन और जलाभिषेक किए, वहीं दूसरी ओर यादव समाज ने अपनी सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए शहर के पांच प्रमुख शिवालयों में गंगाजल अर्पित कर भगवान शिव का विधिवत अभिषेक किया। त्रिशूल, डमरू और "हर-हर महादेव" के गगनभेदी जयघोष के बीच निकली यह धार्मिक यात्रा लोगों के आकर्षण का केंद्र रही।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस परंपरा की शुरुआत एक भीषण अकाल के बाद हुई थी। कहा जाता है कि एक समय पूरे देश में वर्षा नहीं होने से जनजीवन संकट में पड़ गया था। तब काशी के यादव समाज ने भगवान शिव को प्रसन्न करने का संकल्प लिया और सावन के पहले सोमवार को विभिन्न शिवालयों में गंगाजल से जलाभिषेक किया। मान्यता है कि इसके बाद अच्छी वर्षा हुई और अकाल समाप्त हो गया। तभी से यादव समाज इस परंपरा का निरंतर पालन करता आ रहा है।

यादव समाज से जुड़े मुन्नालाल यादव ने बताया कि समाज के लोग प्रत्येक वर्ष सावन के पहले सोमवार को पारंपरिक वेशभूषा में केदार घाट से गंगाजल लेकर यात्रा प्रारंभ करते हैं। इसके बाद श्रद्धालु गौरी केदारेश्वर महादेव, तिलभांडेश्वर महादेव, श्री काशी विश्वनाथ, महामृत्युंजय महादेव और मार्कण्डेय महादेव मंदिर पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। उन्होंने बताया कि यह परंपरा उन्हें अपने पूर्वजों से विरासत में मिली है, जिसे नई पीढ़ी भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ आगे बढ़ा रही है।

धार्मिक यात्रा के दौरान 151 से अधिक कलाकारों का डमरू दल विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। डमरू की गूंज और "महादेव-महादेव" के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों पर आधारित आकर्षक झांकियों ने भी श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा।

यात्रा को शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए प्रशासन ने व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की थी। पूरे मार्ग पर पुलिस बल तैनात रहा और जगह-जगह श्रद्धालुओं का पुष्पवर्षा कर स्वागत किया गया। आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का यह अनूठा संगम सावन के पहले सोमवार को काशी की धार्मिक पहचान को एक बार फिर जीवंत करता नजर आया।






