अंबुवाची पर्व के समापन पर मां कामाख्या धाम में उमड़ा आस्था का जनसैलाब, भक्तों ने की 108 परिक्रमा, गूंजे माता के जयकारे
वाराणसी। शक्ति साधना और देवी उपासना के प्रमुख पर्व अंबुवाची के समापन के बाद शुक्रवार को कमच्छा स्थित प्राचीन मां कामाख्या देवी मंदिर के कपाट वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। तीन दिनों तक चले विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के पश्चात मंदिर खुलते ही भोर से ही दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग गईं। पूरे दिन मंदिर परिसर में भक्तों की भारी भीड़ रही और "जय मां कामाख्या" के जयघोष से वातावरण पूरी तरह भक्तिमय बना रहा।
मंदिर के प्रधान पुजारी देवेंद्रपुरी ने मां कामाख्या का विशेष श्रृंगार कर पूजा-अर्चना संपन्न कराई। इसके बाद श्रीमहामुद्रा यंत्र का महाभिषेक किया गया और श्रद्धालुओं को यंत्र के दर्शन का अवसर प्रदान किया गया। बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने माता के चरणों में चुनरी, नारियल, फल-फूल और श्रृंगार सामग्री अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना की।

अंबुवाची पर्व के दौरान 108 परिक्रमा का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इसी मान्यता के अनुरूप महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों तथा दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभाव के साथ मंदिर की 108 परिक्रमा कर मां का आशीर्वाद प्राप्त किया। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस अवसर पर विधिपूर्वक पूजा और परिक्रमा करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है तथा सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
मंदिर प्रशासन ने बताया कि अंबुवाची पर्व के दौरान मां को अर्पित की गई पवित्र चुनरी का वितरण आगामी 30 जून को श्रद्धालुओं के बीच किया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस चुनरी को घर में स्थापित करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और परिवार पर देवी की विशेष कृपा बनी रहती है।

उधर, पांडेयघाट स्थित प्राचीन काली मां मंदिर में भी चार दिवसीय अंबुवाची महापूजन एवं शक्ति साधना का आयोजन श्रद्धापूर्वक संपन्न हुआ। मंदिर के महंत राज कुमार शुक्ला के नेतृत्व में विशेष पूजन, हवन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए। उन्होंने बताया कि अंबुवाची पर्व देवी शक्ति की आराधना का अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर है और इस दौरान की गई साधना से साधकों को विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा तथा सिद्धि की प्राप्ति होती है।
दोनों मंदिरों में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर समितियों के स्वयंसेवक पूरे समय व्यवस्था संभालते रहे। श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के बीच संपन्न हुए अंबुवाची पर्व ने एक बार फिर काशी की समृद्ध धार्मिक परंपरा और शक्ति उपासना की गौरवशाली संस्कृति को जीवंत कर दिया।

