नाग पंचमी पर तुलसी घाट का ऐतिहासिक अखाड़ा बना कुश्ती परंपरा का गवाह, बच्चों से बुजुर्गों तक ने दिखाए दांव-पेच, बारिश के बीच भी पहलवानों में दिखा उत्साह
हनुमान पूजन के बाद शुरू हुई कुश्ती, नीदरलैंड के हर्बर्ट ने भी करीब से समझी भारतीय पहलवानी की परंपरा
आठ वर्ष के बच्चों से लेकर 70 वर्ष तक के बुजुर्ग पहलवानों ने अखाड़े में आजमाए दांव-पेच, अखाड़े की मिट्टी में बच्चों और बुजुर्गों में समान दिखा पहलवानी का जुनून
नीदरलैंड के हर्बर्ट ने भारतीय कुश्ती और अखाड़ा संस्कृति को करीब से समझा, 2017 में पहली बार भारत आए थे और तभी से पारंपरिक कुश्ती में रुचि बढ़ी
नाग पंचमी का आयोजन काशी की पुरानी अखाड़ा संस्कृति और गुरु-शिष्य परंपरा को आगे बढ़ाने का माध्यम बना
रिपोर्ट : ओमकार नाथ
वाराणसी। नाग पंचमी के पावन अवसर पर काशी का ऐतिहासिक तुलसी घाट अखाड़ा एक बार फिर सदियों पुरानी कुश्ती और पहलवानी की परंपरा का गवाह बना। सुबह हनुमान पूजन के बाद अखाड़े की मिट्टी में पहलवानों ने उतरकर दांव-पेच आजमाए। बारिश के बावजूद पहलवानों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। खास बात यह रही कि करीब आठ वर्ष के बच्चों से लेकर 70 वर्ष तक के बुजुर्गों ने अखाड़े में उतरकर अपनी कला और अनुभव का प्रदर्शन किया।

हनुमान पूजन के बाद शुरू हुआ कुश्ती का दौर
नाग पंचमी पर सुबह करीब नौ बजे अखाड़े में विधि-विधान से पवनपुत्र हनुमान का पूजन किया गया। पहलवानों ने बजरंगबली के समक्ष शीश नवाकर अखाड़े की परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। इसके बाद मिट्टी को नमन कर पहलवानों की जोड़ियां बनाई गईं और कुश्ती का दौर शुरू हुआ। अखाड़े में मौजूद लोगों ने तालियां बजाकर पहलवानों का उत्साह बढ़ाया।

उम्र का फासला मिटा, मिट्टी में दिखा पहलवानी का जुनून
तुलसी घाट के अखाड़े में बच्चों, युवाओं और बुजुर्ग पहलवानों ने एक साथ कुश्ती की। छोटे पहलवानों ने फुर्ती और उत्साह से दर्शकों का ध्यान खींचा तो बुजुर्ग पहलवानों ने अपने अनुभव और तकनीक से अखाड़े की पुरानी परंपरा को जीवंत रखा। उम्र का अंतर कई दशकों का होने के बावजूद अखाड़े की मिट्टी में उतरते ही सभी में पहलवानी का जुनून समान दिखाई दिया।
बारिश से कम हुई भीड़, उत्साह बरकरार
लगातार बारिश के कारण इस बार पिछले वर्षों की तुलना में अखाड़े में पहलवानों और दर्शकों की संख्या कुछ कम रही। इसके बावजूद आयोजन में पहुंचे लोगों के उत्साह में कोई कमी नहीं थी। बारिश के बीच भी लोग पहलवानों के दांव-पेच देखने के लिए अखाड़े में डटे रहे। स्थानीय लोगों के लिए यह आयोजन महज कुश्ती नहीं, बल्कि काशी की पारंपरिक अखाड़ा संस्कृति से जुड़ने का अवसर रहा।

नीदरलैंड के हर्बर्ट ने समझी भारतीय कुश्ती की बारीकियां
नाग पंचमी के आयोजन में नीदरलैंड के हर्बर्ट की मौजूदगी भी आकर्षण का केंद्र रही। भारतीय पारंपरिक कुश्ती और अखाड़ा संस्कृति में रुचि रखने वाले हर्बर्ट ने तुलसी घाट के अखाड़े में पहलवानों को कुश्ती करते देखा और भारतीय पहलवानी की बारीकियों को समझा। उन्होंने कहा कि भारतीय कुश्ती की खासियत केवल शारीरिक ताकत नहीं, बल्कि अनुशासन, अभ्यास, गुरु-शिष्य परंपरा और संस्कृति का समन्वय है।
2017 में पहली बार आए थे भारत
हर्बर्ट के मुताबिक वह पहली बार वर्ष 2017 में भारत आए थे। इसी दौरान भारतीय पारंपरिक खेलों और अखाड़ा संस्कृति के प्रति उनकी रुचि बढ़ी। इसके बाद उन्होंने भारतीय कुश्ती और पारंपरिक प्रशिक्षण पद्धतियों को करीब से समझना शुरू किया। भारतीय पहलवानों के अभ्यास और अखाड़े की मिट्टी में होने वाली कसरत से प्रभावित होकर उन्होंने इस परंपरा को और करीब से जाना। वह नीदरलैंड में भी पहलवानों को प्रशिक्षण देते हैं।

