शारदीय नवरात्र : छठवें दिन मां कात्यायनी के दरबार में उमड़े श्रद्धालु, युवतियों ने हल्दी चढ़ाकर मांगा मनचाहा वर
पक्का महल स्थित प्राचीन मंदिर में सुबह से दर्शन-पूजन का क्रम जारी, विवाह संबंधी मनोकामनाओं के लिए हल्दी अर्पित करने की मान्यता
कुंवारी कन्याएं 40 दिनों तक अर्पित करती हैं हल्दी, दही अर्पित करने और ग्रहों की शांति के लिए विशेष पूजा-पाठ
नवरात्र के छठवें दिन मां कात्यायनी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना, सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति के लिए भक्तों ने नवाया शीश
वाराणसी। शारदीय नवरात्र के छठवें दिन शुक्रवार को मां दुर्गा के छठवें स्वरूप मां कात्यायनी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। पक्का महल स्थित प्राचीन मंदिर में सुबह से ही दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। भक्तों ने माता के चरणों में शीश नवाकर सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद मांगा। मंदिर में मां कात्यायनी के दर्शन के साथ भगवान गणेश, शनिदेव और शुक्र व मंगल ग्रहों की शांति के लिए भी विशेष पूजा-पाठ किया जाता है।

हल्दी चढ़ाने से विवाह संबंधी मनोकामना पूरी होने की मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी को हल्दी का लेपन लगाने से विवाह संबंधी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मान्यता है कि कुंवारी कन्याएं लगातार 40 दिनों तक माता को हल्दी अर्पित करती हैं तो उन्हें मनचाहा वर प्राप्त होता है। वहीं, युवक भी माता के चरणों में हल्दी अर्पित कर अच्छी जीवनसंगिनी की कामना करते हैं। मां कात्यायनी को दही अर्पित करने की भी परंपरा है।

मंदिर के महंत के अनुसार, नवरात्र के छठवें दिन मां कात्यायनी की आराधना का विशेष महत्व है। श्रद्धालु सच्चे मन से माता की पूजा कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। धार्मिक विश्वास है कि मां की आराधना से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

कात्यायन ऋषि की पुत्री के रूप में हुआ था प्राकट्य
पंडित शिवशंकर मिश्रा के अनुसार, मां कात्यायनी की चार भुजाएं हैं। उनके हाथों में कमल और तलवार सहित विभिन्न आयुध सुशोभित हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि कात्यायन ने देवी दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। इस पर ऋषि ने देवी को अपनी पुत्री के रूप में प्राप्त करने की इच्छा जताई। उनकी कामना पूरी हुई और देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। इसी कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ा।

