गंगा की लहरों पर सजी सुरों की महफिल, ‘सांझ प्रणामी’ में जीवंत हुईं गिरिजा देवी की स्मृतियां

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वाराणसी। काशी की सांस्कृतिक आत्मा शुक्रवार की शाम एक बार फिर गंगा की लहरों पर झूम उठी। पद्मविभूषण गिरिजा देवी की 97वीं जयंती के अवसर पर आयोजित ‘सांझ प्रणामी’ ने संगीत, श्रद्धा और बनारसी परंपरा का ऐसा अलौकिक संगम प्रस्तुत किया, जिसे उपस्थित श्रोता लंबे समय तक याद रखेंगे। गंगा की मध्यधारा में बहती ठंडी हवाओं, घाटों की जगमगाती रोशनी और सुरों की मधुर गूंज ने पूरी शाम को आध्यात्मिक अनुभूति में बदल दिया।

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कार्यक्रम की शुरुआत संत रविदास घाट से हुई, जहां से अत्याधुनिक क्रूज ने गंगा की धारा में अपनी यात्रा शुरू की। क्रूज जैसे-जैसे अस्सी घाट से आगे बढ़ते हुए वरुणा संगम की ओर बढ़ा, वैसे-वैसे गंगा के दोनों तटों की दृश्यावली संगीत की लय में घुलती चली गई। कहीं विस्तृत रेतीले टीले दिखाई दे रहे थे तो कहीं किनारों पर खड़ी नावें और रोशनी से नहाए घाट काशी की सांस्कृतिक विरासत का एहसास करा रहे थे।

‘सांझ प्रणामी’ की यह परंपरा वर्षों पहले नाटीइमली स्थित गिरिजा देवी के आवास के सामने पार्क से शुरू हुई थी। बाद में इसका आयोजन बजड़े पर होने लगा और इस वर्ष पहली बार इसे क्रूज पर आयोजित किया गया। गंगा की मध्यधारा में आयोजित यह अनूठा आयोजन बनारस की सांगीतिक परंपरा को नए आयाम देता नजर आया।

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कार्यक्रम के पहले सत्र में प्रसिद्ध गायिका सुचेता गांगुली ने अपनी प्रस्तुति से माहौल को सुरमय बना दिया। तेज हवाओं और तकनीकी चुनौतियों के बीच उन्होंने रागश्री की पारंपरिक बंदिश से ऐसा आलाप लिया कि पूरा वातावरण संगीत की तरंगों में डूब गया। हवा के तेज झोंकों से मंच पर लगी फूल-मालाओं की लड़ियां लगातार उड़ रही थीं और बीच-बीच में माइक से अतिरिक्त ध्वनि भी उत्पन्न हो रही थी, लेकिन इन सबके बावजूद सुचेता गांगुली की स्वर साधना में कोई कमी नहीं आई।

उन्होंने खमाज की ठुमरी और दादरा “श्याम तोहें नजरिया लग जाएगी” प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रस्तुति के दौरान उन्होंने कार्यक्रम की आयोजक संस्था ‘सोनचिरैया’ की सचिव एवं पद्मश्री मालिनी अवस्थी तथा रोहित मिश्र को मंच पर आमंत्रित किया। गंगा की लहरों के बीच गूंजते सुरों ने पूरी शाम को भावनात्मक ऊंचाई प्रदान की।

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कार्यक्रम के दूसरे चरण में पद्मविभूषण विश्वमोहन भट्ट ने अपने पुत्र और शिष्य सलिल भट्ट के साथ मंच संभाला। विश्वमोहन भट्ट की मोहन वीणा और सलिल भट्ट की सात्विक वीणा के सुर जैसे ही वातावरण में गूंजे, पूरा माहौल आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। बनारस घराने के युवा तबला वादक अभिषेक मिश्र की संगत ने प्रस्तुति को और प्रभावशाली बना दिया।

राग विश्वरंजनी की प्रस्तुति के दौरान जब क्रूज राजघाट पुल के समीप पहुंचा तो मंच के पीछे आदिकेशव क्षेत्र का अद्भुत दृश्य उभर आया। इसी दौरान सलिल भट्ट ने नमो घाट पर स्थापित ‘नमस्ते’ प्रतिमा की तस्वीर अपने मोबाइल में कैद करते हुए उसे गुरु परंपरा में प्रणामी का प्रतीक बताया। क्रूज की यात्रा के दौरान पंचगंगा घाट का श्रीमठ, बिंदु माधव मंदिर, मणिकर्णिका घाट की जलती चिताएं और रोशनी से जगमगाता काशी विश्वनाथ धाम का गंगा द्वार मानो संगीत प्रस्तुति का हिस्सा बन गए। वहीं दशाश्वमेध घाट पर चल रही गंगा आरती की भव्य छटा ने वातावरण को और दिव्य बना दिया। 

कार्यक्रम के अंतिम चरण में विश्वमोहन भट्ट, सलिल भट्ट और मालिनी अवस्थी ने राग मांड में निबद्ध प्रसिद्ध रचना “केसरिया बालमा” प्रस्तुत की। यह प्रस्तुति पूरी शाम का सबसे भावुक और यादगार क्षण बन गई। सुरों की मधुर संगत और गंगा की लहरों के बीच श्रोताओं ने संगीत को केवल सुना ही नहीं, बल्कि महसूस भी किया। राष्ट्रगान की धुन के साथ ‘सांझ प्रणामी’ का समापन हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर प्रो. चंद्रमौलि उपाध्याय, अशोक गुप्ता, पं. धर्मनाथ मिश्र, डॉ. रत्नेश वर्मा, विवेक मालवीय, जयंत मालवीय, प्रो. संगीता सिंह, मीना मिश्रा, पं. प्रमोद मिश्र, अंशुमान महाराज, नीरज मिश्रा, सौरव मिश्रा, विनय त्रिपाठी और एनके गुप्ता सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रीतेश आचार्य ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन रोहित मिश्र ने प्रस्तुत किया।

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