भगवान जगन्नाथ की भक्ति में डूबी शिव की काशी, विश्वविख्यात रथयात्रा मेले का हुआ शुभारंभ, गूंजा जय जगन्नाथ का उद्घोष
रिपोर्ट- ओमकारनाथ
वाराणसी। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में गुरुवार को आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के पावन अवसर पर विश्वविख्यात भगवान जगन्नाथ रथयात्रा मेले का भव्य शुभारंभ हुआ। सुबह से ही रथयात्रा क्षेत्र और आसपास का इलाका "जय जगन्नाथ" के उद्घोष से गूंज उठा। भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा दिव्य रथ पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देने निकले। रथयात्रा के साथ ही काशी के ऐतिहासिक तीन दिवसीय लक्खा मेले की भी शुरुआत हो गई, जिसमें तीन दिनों तक लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।

गुरुवार की सुबह पांच बजे भगवान की पारंपरिक मंगला आरती संपन्न हुई। इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान का विधिवत स्नान, नवीन वस्त्र एवं अलंकरण किया गया। भगवान को 56 प्रकार के व्यंजनों (छप्पन भोग) का भोग अर्पित किया गया। इसके बाद श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ रथ की रस्सी पकड़कर भगवान के रथ को खींचा और रथयात्रा का शुभारंभ किया। मान्यता है कि भगवान के रथ को खींचने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन
काशी की यह रथयात्रा लगभग दो शताब्दियों से अधिक पुरानी परंपरा है। मान्यता के अनुसार वर्ष 1790 में अस्सी क्षेत्र में भगवान जगन्नाथ मंदिर की स्थापना हुई थी। इसके बाद वर्ष 1802 से काशी में रथयात्रा मेले का आयोजन प्रारंभ हुआ, जो आज विश्वविख्यात लक्खा मेले का स्वरूप ले चुका है। यह आयोजन काशी की धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।

धार्मिक मान्यता है कि जो श्रद्धालु किसी कारणवश ओडिशा स्थित जगन्नाथ पुरी धाम नहीं जा पाते, उन्हें काशी में भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने से पुरी धाम के दर्शन के समान पुण्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि रथयात्रा के दौरान दूर-दराज के जिलों सहित अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु काशी पहुंचते हैं।
15 दिन के 'अनवसर' के बाद भक्तों को दिए दर्शन
मंदिर के पुजारी राधेश्याम पांडेय ने बताया कि स्नान पूर्णिमा पर भगवान का महाअभिषेक होने के बाद धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके चलते लगभग 15 दिनों तक मंदिर के कपाट बंद रहते हैं और इस अवधि में भगवान को औषधीय गुणों से युक्त परवल के काढ़े का भोग लगाया जाता है। स्वस्थ होने के बाद भगवान बुधवार को डोली यात्रा के माध्यम से अपने मौसी स्थल बेणीराम बाग पहुंचे, जहां रात्रि विश्राम के बाद गुरुवार सुबह रथ पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन दिए। उन्होंने बताया कि रथयात्रा के दिन भगवान का विशेष श्रृंगार किया जाता है तथा दिनभर चार पहर की आरती और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होते हैं, जिनमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते हैं।

काशी नरेश भी खींचेंगे रथ
रथयात्रा मेले के दूसरे दिन 17 जुलाई को काशी नरेश महाराजा बनारस भी पारंपरिक रीति से रथ की रस्सी पकड़कर भगवान का रथ खींचेंगे। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और श्रद्धालु इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होते हैं।
नानखटाई का विशेष महत्व
रथयात्रा मेले की एक विशेष पहचान नानखटाई भी है। भगवान जगन्नाथ को इस विशेष मिठाई का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि वर्ष में केवल रथयात्रा मेले के दौरान ही यह पारंपरिक नानखटाई बड़ी मात्रा में उपलब्ध होती है। श्रद्धालु इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं और अपने घर भी लेकर जाते हैं।

हजारों श्रद्धालुओं ने किया दर्शन
सुबह से ही रथयात्रा क्षेत्र में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग भगवान के दर्शन के लिए लंबी कतारों में खड़े दिखाई दिए। पूरा क्षेत्र शंखध्वनि, घंटों की गूंज, डमरू और "जय जगन्नाथ" के उद्घोष से भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा।
श्रद्धालु ऊमा ने कहा कि काशीवासियों को पूरे वर्ष इस मेले का इंतजार रहता है। भगवान जगन्नाथ के दर्शन और नानखटाई के प्रसाद का अपना अलग ही महत्व है। रथयात्रा के इन दिनों में काशी का यह क्षेत्र साक्षात जगन्नाथ पुरी जैसा प्रतीत होता है।

बृजेश सिंह बोले- भगवान का आशीर्वाद सभी पर बना रहे
मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं पूर्व एमएलसी बृजेश सिंह ने मंगला आरती में शामिल होकर भगवान का आशीर्वाद लिया। उन्होंने कहा कि यह सैकड़ों वर्षों से चली आ रही दिव्य परंपरा है। काशी स्वयं में आस्था और अध्यात्म की राजधानी है। आज हजारों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पहुंचे हैं। भगवान जगन्नाथ की कृपा सभी पर बनी रहे और सभी की मनोकामनाएं पूर्ण हों, यही प्रार्थना है।
सुरक्षा और व्यवस्थाओं के पुख्ता इंतजाम
रथयात्रा मेले में लाखों श्रद्धालुओं के आगमन को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। पुलिस बल, यातायात पुलिस, पीएसी और स्वयंसेवकों की तैनाती की गई है। भीड़ नियंत्रण, यातायात व्यवस्था, चिकित्सा सुविधा और निगरानी के लिए विशेष प्रबंध किए गए हैं, ताकि श्रद्धालु सुरक्षित और सुगमता से भगवान के दर्शन कर सकें।
तीन दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक मेले में धार्मिक अनुष्ठानों, सांस्कृतिक परंपराओं और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिलेगा। काशी एक बार फिर भगवान जगन्नाथ की भक्ति में सराबोर है और पूरा वातावरण "जय जगन्नाथ" के जयघोष से गूंज रहा है।

