15 दिनों तक भगवान जगन्नाथ को लगेगा काढ़े का भोग, स्वास्थ्य प्रसाद पाने उमड़ने लगे भक्त
वाराणसी। धर्म और परंपराओं की नगरी काशी में अनेक ऐसी धार्मिक मान्यताएं जीवंत हैं, जो देश-दुनिया के श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। इन्हीं अनूठी परंपराओं में से एक है अस्सी क्षेत्र स्थित प्राचीन भगवान जगन्नाथ मंदिर की, जहां स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को 15 दिनों तक विशेष औषधीय काढ़े का भोग लगाया जाता है। इसके बाद यही काढ़ा भक्तों में प्रसाद के रूप में वितरित किया गया।

धार्मिक मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का भव्य स्नान कराया जाता है। स्नान के बाद भगवान को ज्वर बुखार) हो जाता है, जिसके कारण वे 15 दिनों तक विश्राम करते हैं। इस अवधि में भगवान के नियमित दर्शन भी बंद रहते हैं। इसी दौरान उनके स्वास्थ्य लाभ के लिए आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से तैयार विशेष काढ़े का भोग लगाया जाता है।

मंदिर के पुजारियों के अनुसार यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है। तुलसी, काली मिर्च, अदरक, लौंग, दालचीनी, इलायची समेत कई औषधीय जड़ी-बूटियों से तैयार इस काढ़े को पहले भगवान को अर्पित किया जाता है और उसके बाद श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

स्वास्थ्य और आस्था का अद्भुत संगम
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ के चरणों में अर्पित इस काढ़े के प्रसाद का सेवन करने से वर्ष भर रोगों से रक्षा होती है तथा शरीर स्वस्थ रहता है। यही कारण है कि इन 15 दिनों के दौरान मंदिर में सुबह से ही भक्तों की लंबी कतारें लगती हैं। काशी ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु इस प्रसाद को ग्रहण करने पहुंचते हैं।

काशी की अनूठी परंपरा
अस्सी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर की यह परंपरा देश के अन्य जगन्नाथ मंदिरों से अलग मानी जाती है। यहां भगवान के उपचार का प्रतीक यह विशेष अनुष्ठान आस्था, आयुर्वेद और सनातन परंपरा का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। भगवान के स्वास्थ्य लाभ के बाद श्रद्धालु उनकी पुनः दर्शन की प्रतीक्षा करते हैं और इसके पश्चात रथयात्रा सहित अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत होती है।
श्रद्धालुओं में उत्साह
इन दिनों मंदिर परिसर में धार्मिक वातावरण बना हुआ है। भक्त भगवान जगन्नाथ के दर्शन, पूजन और काढ़े के प्रसाद के लिए बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भगवान का यह औषधीय प्रसाद केवल शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा भी प्रदान करता है। काशी की इस सदियों पुरानी परंपरा में आज भी आस्था उसी श्रद्धा के साथ जीवित है, जहां भगवान को पहले औषधि अर्पित की जाती है और फिर वही औषधि प्रसाद बनकर हजारों श्रद्धालुओं के बीच स्वास्थ्य और विश्वास का संदेश पहुंचाती है।

