भक्तों के प्रेम में बीमार पड़ते हैं भगवान जगन्नाथ, 14 दिनों तक औषधीय काढ़े से होती है सेवा, फिर देते हैं दर्शन
वाराणसी। सनातन धर्म की परंपराओं में भगवान जगन्नाथ की पूजा का विशेष महत्व है। भगवान विष्णु के स्वरूप माने जाने वाले जगन्नाथ अपने भक्तों के प्रति प्रेम और करुणा के प्रतीक हैं। इन्हीं भावनाओं से जुड़ी एक अनोखी धार्मिक परंपरा हर वर्ष ज्येष्ठ पूर्णिमा के बाद निभाई जाती है, जब मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा स्नान महोत्सव के बाद अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद तीनों विग्रह 14 दिनों के लिए एकांतवास, जिसे अनवसर काल कहा जाता है, में चले जाते हैं। इस दौरान मंदिर के पट बंद रहते हैं और भगवान की सेवा एक रोगी की तरह विशेष देखभाल के साथ की जाती है।

वाराणसी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर के पुजारी राधेश्याम पांडेय बताते हैं कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। मान्यता है कि स्नान महोत्सव में 108 कलशों से दिव्य स्नान कराने के बाद भगवान को ज्वर हो जाता है। इसलिए उन्हें सामान्य भोग नहीं लगाया जाता, बल्कि आयुर्वेदिक औषधियों से तैयार विशेष काढ़ा और हल्के औषधीय भोग अर्पित किए जाते हैं। इस अवधि में भगवान विश्राम करते हैं और श्रद्धालुओं को उनके प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होते।

पुजारी के अनुसार भगवान को अर्पित किया जाने वाला विशेष काढ़ा मिट्टी के चूल्हे पर पारंपरिक विधि से तैयार किया जाता है। इसमें काली मिर्च, लौंग, छोटी इलायची, बड़ी इलायची, जायफल, तुलसी, खांडसारी, कच्ची चीनी सहित कई औषधीय सामग्री मिलाई जाती है। इन सभी पदार्थों को लगभग एक घंटे तक धीमी आंच पर पकाया जाता है। तैयार होने के बाद सबसे पहले भगवान को इसका भोग लगाया जाता है और फिर इसे प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है।

भगवान जगन्नाथ को अर्पित होने वाले काढ़े में शामिल औषधियों के गुण
काली मिर्च – शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक मानी जाती है। यह सर्दी, जुकाम और पाचन संबंधी समस्याओं में लाभकारी होती है।
लौंग – इसमें जीवाणुरोधी और दर्द निवारक गुण पाए जाते हैं। यह गले की खराश, खांसी और संक्रमण से बचाव में उपयोगी मानी जाती है।
छोटी इलायची – पाचन तंत्र को मजबूत करने, मुंह की दुर्गंध दूर करने तथा शरीर को ताजगी देने में सहायक मानी जाती है।
बड़ी इलायची – श्वसन तंत्र के लिए लाभकारी मानी जाती है। यह कफ और सर्दी-जुकाम में राहत पहुंचाने में सहायक होती है।
जायफल – शरीर को ऊर्जा देने, पाचन सुधारने तथा मानसिक शांति प्रदान करने वाले गुणों के लिए जाना जाता है।
तुलसी – आयुर्वेद में तुलसी को अमृत समान माना गया है। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, वायरल संक्रमण से बचाव और श्वसन संबंधी समस्याओं में लाभकारी मानी जाती है।
खांडसारी – प्राकृतिक मिठास का स्रोत होने के साथ यह शरीर को ऊर्जा प्रदान करती है तथा काढ़े के स्वाद और औषधीय संतुलन को बनाए रखती है।
कच्ची चीनी – शरीर को ऊर्जा देने के साथ औषधीय मिश्रण के स्वाद को संतुलित करती है और पारंपरिक काढ़े का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
14 दिनों तक चलता है उपचार
पुजारी राधेश्याम पांडेय बताते हैं कि यह औषधीय सेवा लगातार 14 दिनों तक चलती है। इस दौरान भगवान पूर्ण विश्राम करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि उपचार और विश्राम के बाद भगवान पूरी तरह स्वस्थ होकर नवयौवन स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इस अवसर को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं और भगवान के नवयौवन दर्शन का लाभ प्राप्त करते हैं।
भगवान जगन्नाथ की यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, आयुर्वेद और लोक परंपराओं के गहरे संबंध को भी दर्शाती है। यह संदेश देती है कि प्रकृति, औषधियों और स्वास्थ्य का महत्व भारतीय जीवन दर्शन में सदियों से स्वीकार किया जाता रहा है। भगवान की सेवा में औषधीय काढ़े का उपयोग इस बात का प्रतीक है कि स्वस्थ जीवन और प्राकृतिक चिकित्सा का महत्व हमारी धार्मिक परंपराओं में भी समान रूप से निहित है। यही कारण है कि यह अनूठी परंपरा आज भी श्रद्धा, विश्वास और पारंपरिक विधि-विधान के साथ निभाई जाती है।

