काशी की शास्त्रार्थ परंपरा का देशभर में हो विस्तार, राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने बताई महत्ता, बीएचयू में महर्षि पतंजलि जन्मजयंती महोत्सव पर विद्वत सम्मान समारोह

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वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में महर्षि पतंजलि जन्मजयंती महोत्सव के अवसर पर आयोजित विद्वत सम्मान समारोह में तेलंगाना के राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने काशी की ज्ञान और शास्त्रार्थ परंपरा को देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि काशी ज्ञान, अध्यात्म और भारतीय परंपराओं की भूमि है। संस्कृत को व्यवहार में अधिकाधिक प्रयोग किए जाने की आवश्यकता है। ऐसे प्रयासों से भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यापक पहचान मिल सकती है। समारोह में शास्त्रार्थ, संस्कृत, भारतीय दर्शन और ज्ञान परंपरा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले विद्वानों को सम्मानित किया गया।

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उत्तर प्रदेश नागकूप शास्त्रार्थ समिति, वाराणसी एवं वैदिक विज्ञान केन्द्र, बीएचयू के संयुक्त तत्वावधान में वैदिक विज्ञान केन्द्र सभागार में आयोजित समारोह की अध्यक्षता कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने की। विशिष्ट अतिथि पद्मभूषण प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी एवं विधायक डॉ. नीलकंठ तिवारी रहे। राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल ने कहा कि काशी की ज्ञान और शास्त्रार्थ की परंपरा का विस्तार देश के विभिन्न क्षेत्रों तक होना चाहिए। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों और विद्वानों द्वारा भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने के प्रयासों की सराहना की। समारोह में सम्मानित सभी विद्वानों को शुभकामनाएं देते हुए उन्होंने शास्त्रार्थ एवं विद्वत परंपरा को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।

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शास्त्रार्थ भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण आधार
अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि शास्त्रार्थ भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण आधार है। प्रश्न और उत्तर के माध्यम से ज्ञान को आगे बढ़ाने की यह परंपरा भारतीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान रही है। उन्होंने कहा कि काशी में हो रहे विशिष्ट ज्ञान कार्यों को देश के अन्य हिस्सों तक पहुंचाने के लिए व्यापक प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि काशी की ज्ञान परंपरा का विस्तार पूरे भारत में हो सके।

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उन्होंने संस्कृत के शिक्षण को अधिक सहज, रोचक और आकर्षक बनाने पर भी जोर दिया। कहा कि आज विद्यार्थियों को संस्कृत कई बार गणित जैसे कठिन विषय की तरह प्रतीत होती है। ऐसे में संस्कृत को केवल एक विषय के रूप में पढ़ाने के बजाय ज्ञान, तर्क और भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपरा से जोड़ने की जरूरत है, जिससे विद्यार्थियों में इसके प्रति रुचि और जिज्ञासा विकसित हो।

शास्त्रार्थ ज्ञान के निरंतर विकास का माध्यम
डॉ. नीलकंठ तिवारी ने काशी की प्राचीन ज्ञान एवं शास्त्रार्थ परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि काशी सदियों से ज्ञान और सत्य की खोज का केंद्र रही है। शास्त्रार्थ केवल अतीत की परंपरा नहीं, बल्कि ज्ञान के निरंतर विकास का माध्यम है। उन्होंने उत्तर प्रदेश नागकूप शास्त्रार्थ समिति के प्रयासों की सराहना करते हुए भविष्य में इस दिशा में और व्यापक आयोजन किए जाने की आवश्यकता बताई।

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स्वागत उद्बोधन में प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी ने काशी की विद्वत परंपरा और शास्त्रार्थ की ऐतिहासिक महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन युवा पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मंच संचालन प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रो. विनय कुमार पाण्डेय ने किया। 

समारोह में आचार्य डॉ. पी.के. माधवन, आचार्य कमलेश झा, आचार्य ललित कुमार त्रिपाठी, आचार्य हरिदत्त शर्मा, आचार्य रामपूजन पाण्डेय, आचार्य सुधाकर मिश्र, आचार्य श्रीनारायण तिवारी, आचार्य किशोरचन्द्र पाण्डे, आचार्य दिनेश कुमार गंग, आचार्य ओमनाथ विमली, आचार्य चतुरशिरोमणि शर्मा और आचार्य दिव्यचेतन ब्रह्मचारी सहित अनेक विद्वानों को सम्मानित किया गया। विभिन्न श्रेणियों में अन्नपूर्णाजी सम्मान, जमदग्नि श्रीमान्नाचार्य महाराज सम्मान, आचार्य रामप्रसाद त्रिपाठी सम्मान, स्वामी श्रीविद्यानन्द सरस्वती सम्मान, ब्रह्मचारी शंकरदेव चैतन्य सम्मान, पद्मश्री आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सम्मान, आचार्य प्रभानाथ द्विवेदी सम्मान और आचार्य गजानन शास्त्री मुमलगांवकर सम्मान प्रदान किए गए। समारोह में बड़ी संख्या में विद्वान, शिक्षक, विद्यार्थी एवं गणमान्यजन उपस्थित रहे।

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