रथयात्रा के पावन अवसर पर 1950 में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी भारत कला भवन की नींव, भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत का केंद्र है भवन 

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वाराणसी। बीएचयू परिसर स्थित भारत कला भवन ने अपना 76वां स्थापना दिवस मनाया। भारतीय कला, संस्कृति और इतिहास के संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाला यह संग्रहालय आज देश के सबसे प्रतिष्ठित संग्रहालयों में गिना जाता है। स्थापना दिवस के अवसर पर भारत कला भवन की ऐतिहासिक यात्रा, सांस्कृतिक योगदान और भावी पीढ़ियों के लिए इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने कहा कि भारत कला भवन केवल दुर्लभ वस्तुओं का संग्रह नहीं, बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का जीवंत केंद्र है।

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रथयात्रा के शुभ अवसर पर रखी गई थी नींव
भारत कला भवन की वर्तमान इमारत की आधारशिला वर्ष 1950 में रथयात्रा के पावन अवसर पर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने रखी थी। यह ऐतिहासिक क्षण बीएचयू के इतिहास के साथ-साथ भारतीय संग्रहालय परंपरा में भी विशेष महत्व रखता है। इसके बाद संग्रहालय का लगातार विस्तार हुआ और आज यह देश-विदेश के शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और कला प्रेमियों के लिए अध्ययन एवं शोध का प्रमुख केंद्र बन चुका है।

राय कृष्ण दास का सपना बना भारत की सांस्कृतिक धरोहर
भारत कला भवन की स्थापना का श्रेय प्रख्यात कला मर्मज्ञ, साहित्यकार और संस्कृति प्रेमी राय कृष्ण दास को जाता है। उन्होंने भारतीय कला और पुरावशेषों के संरक्षण के उद्देश्य से इस संग्रहालय की नींव रखी थी। बाद में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से इसे काशी हिंदू विश्वविद्यालय से जोड़ा गया। समय के साथ देश के अनेक राजघरानों, कलाकारों, विद्वानों और कला संग्राहकों ने अपनी दुर्लभ कलाकृतियां यहां दान कीं, जिससे इसका संग्रह लगातार समृद्ध होता गया।

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हजारों दुर्लभ धरोहरों का अनमोल खजाना
भारत कला भवन में भारतीय इतिहास और संस्कृति से जुड़ी हजारों दुर्लभ एवं अमूल्य वस्तुएं संरक्षित हैं। यहां प्राचीन मूर्तियां, ताम्रपत्र, दुर्लभ पांडुलिपियां, लघु चित्र, मुगल एवं राजस्थानी चित्रकला, बनारस की पारंपरिक कलाकृतियां, वस्त्र, आभूषण, सिक्के, हथियार, लोक एवं जनजातीय कला, टेराकोटा प्रतिमाएं और पुरातात्विक अवशेष सुरक्षित रखे गए हैं।

संग्रहालय की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लघु चित्रकला (मिनिएचर पेंटिंग) का विश्वस्तरीय संग्रह है, जिसे कला इतिहास के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अलावा भगवान बुद्ध, जैन तीर्थंकरों, हिंदू देवी-देवताओं तथा मध्यकालीन भारतीय कला से संबंधित दुर्लभ प्रतिमाएं भी यहां आकर्षण का केंद्र हैं।

शोध और शिक्षा का प्रमुख केंद्र
भारत कला भवन केवल पर्यटकों के भ्रमण का स्थल नहीं, बल्कि शोध और अकादमिक गतिविधियों का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां देश-विदेश के शोधार्थी भारतीय कला, संस्कृति, पुरातत्व और संग्रहालय विज्ञान पर अध्ययन करने आते हैं। समय-समय पर संग्रहालय में विशेष प्रदर्शनियां, व्याख्यान, कार्यशालाएं और शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिससे नई पीढ़ी को भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का प्रयास किया जाता है।

भारतीय संस्कृति का जीवंत दस्तावेज
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत कला भवन भारतीय सभ्यता की निरंतरता का सशक्त प्रमाण है। यहां संरक्षित धरोहरें भारत के सांस्कृतिक विकास, कला परंपराओं और सामाजिक इतिहास को समझने का अवसर प्रदान करती हैं। संग्रहालय में आने वाला प्रत्येक आगंतुक भारतीय संस्कृति की विविधता, प्राचीनता और समृद्धि का अनुभव करता है।

सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का संदेश
स्थापना दिवस के अवसर पर यह संदेश दिया गया कि संग्रहालयों की भूमिका अब केवल पुरावशेषों को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं है। आधुनिक समय में उनका दायित्व सांस्कृतिक विरासत को डिजिटल माध्यमों से संरक्षित करना, युवाओं को इतिहास से जोड़ना और समाज में विरासत संरक्षण के प्रति जागरुकता बढ़ाना भी है।

पिछले सात दशकों से अधिक समय से भारत कला भवन भारतीय कला एवं संस्कृति के संरक्षण, शोध और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। यही कारण है कि यह संग्रहालय आज भी बीएचयू की पहचान के साथ-साथ भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का एक गौरवशाली प्रतीक बना हुआ है।

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