IIT BHU और पारुल विश्वविद्यालय ने विकसित की पर्यावरण-अनुकूल नैनो तकनीक, अपशिष्ट जल से विषैले और कैंसरकारी डाई को हटाने में मिलेगी मदद 

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वाराणसी। IIT BHU एवं Parul University के शोधकर्ताओं ने औद्योगिक अपशिष्ट जल से विषैले और कैंसरकारी डाई “मैलाकाइट ग्रीन” को हटाने के लिए एक अभिनव हरित तकनीक विकसित कर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। शोधकर्ताओं का दावा है कि यह तकनीक न केवल अत्यंत प्रभावी है, बल्कि कम लागत वाली और पर्यावरण-अनुकूल भी है।

यह संयुक्त शोध कार्य IIT (BHU) के स्कूल ऑफ बायोकेमिकल इंजीनियरिंग तथा पारुल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, वडोदरा के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग द्वारा किया गया। शोध दल का नेतृत्व IIT (BHU) के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विशाल मिश्रा ने किया। टीम में आलोक तिवारी, गौरांग डामले, डॉ. शिवेंदु सक्सेना, डॉ. विशाल सांधवार, सुश्री दीक्षा सक्सेना और JSPM University के डॉ. दीपक जाधव भी शामिल रहे।

इस शोध के परिणाम प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल Royal Society of Chemistry की पत्रिका RSC Advances में “Adsorption of Malachite Green from Aqueous Solutions Using a Novel SnO₂/PANI-Co-PPy Nanocomposite” शीर्षक से प्रकाशित हुए हैं। शोध में विकसित विशेष नैनोकॉम्पोजिट को संतरे के छिलकों के अर्क की सहायता से तैयार किया गया है। इसमें संतरे के छिलके को प्राकृतिक रिड्यूसिंग एजेंट के रूप में इस्तेमाल किया गया, जिससे यह तकनीक पूरी तरह हरित और अपशिष्ट-आधारित बन गई है।

शोधकर्ताओं ने बताया कि इस नैनोकॉम्पोजिट में टिन ऑक्साइड (SnO₂) नैनोकणों पर पॉलिएनिलीन (PANI) एवं पॉलीपाइरोल (PPy) की सह-पॉलीमरित परत विकसित की गई है। यह संरचना औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद मैलाकाइट ग्रीन डाई को तेजी से अवशोषित करने में सक्षम है। परीक्षणों में यह तकनीक केवल 30 मिनट में 97.06 प्रतिशत तक डाई हटाने में सफल रही। इसकी एडसॉर्प्शन क्षमता 1250 mg g⁻¹ दर्ज की गई, जो इसे अत्यंत प्रभावशाली बनाती है।

शोध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें महंगे उपकरणों, खतरनाक रसायनों या अत्यधिक प्रशिक्षित श्रमिकों की आवश्यकता नहीं पड़ती। साथ ही यह तकनीक गैर-विषाक्त, जैव-संगत और बड़े स्तर पर औद्योगिक उपयोग के लिए आसानी से विस्तार योग्य है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे वस्त्र, रसायन और रंग उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषित जल के उपचार में बड़ी मदद मिल सकती है।

IIT (BHU) के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने इस उपलब्धि पर शोधकर्ताओं को बधाई देते हुए कहा कि संस्थान सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान के लिए सतत एवं उपयोगी तकनीकों के विकास हेतु प्रतिबद्ध है। वहीं डॉ. विशाल मिश्रा ने कहा कि यह शोध दोनों संस्थानों के बीच मजबूत अकादमिक सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो भविष्य में औद्योगिक अपशिष्ट जल शोधन के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोलेगा।

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