चंद्रमा पर मानव बस्ती बसाने के अभियान में IIT (BHU) का अहम योगदाम, कृत्रिम चंद्र मिट्टी और धातु निष्कर्षण तकनीक पर शोध 

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वाराणसी। भारत के भविष्य के चंद्र अभियानों और दीर्घकालिक मानव अंतरिक्ष मिशनों को नई गति देने की दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी-बीएचयू), वाराणसी ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की सतह जैसी विशेषताओं वाली "लूनर सॉइल सिमुलेंट" (कृत्रिम चंद्र मिट्टी) विकसित करने में सफलता प्राप्त की है। इसके साथ ही इस कृत्रिम चंद्र मिट्टी से धातुओं के निष्कर्षण (मेटल एक्सट्रैक्शन) और उससे निर्माण सामग्री तैयार करने की तकनीकों पर भी शोध तेजी से आगे बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह उपलब्धि भविष्य में चंद्रमा पर स्थायी मानव बस्ती बसाने और स्थानीय संसाधनों से आधारभूत ढांचा तैयार करने की दिशा में भारत के प्रयासों को मजबूती देगी।

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चंद्रयान-3 मिशन की ऐतिहासिक सफलता के बाद भारत ने चंद्र अन्वेषण और मानव अंतरिक्ष अभियानों को नई प्राथमिकता दी है। इसी क्रम में आईआईटी (बीएचयू) का यह शोध अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संस्थान अब उन चुनिंदा भारतीय शैक्षणिक संस्थानों में शामिल हो गया है, जो चंद्र मिट्टी के कृत्रिम स्वरूप का उपयोग कर 3डी प्रिंटिंग आधारित ईंट, टाइल, लैंडिंग पैड और अन्य संरचनात्मक सामग्री विकसित करने पर काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य भविष्य में चंद्रमा पर उपलब्ध संसाधनों का वहीं उपयोग कर निर्माण कार्य करना है, जिससे पृथ्वी से भारी मात्रा में निर्माण सामग्री ले जाने की आवश्यकता कम हो सके।

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इस बहु-विषयक शोध परियोजना का नेतृत्व आईआईटी (बीएचयू) के मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. कमलेश कुमार सिंह कर रहे हैं। उनके साथ मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. पवन शर्मा चंद्र निर्माण सामग्री की 3डी प्रिंटिंग तकनीक विकसित करने पर कार्य कर रहे हैं। वहीं केमिकल इंजीनियरिंग विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. उदिता घोष लूनर सिमुलेंट के रियोलॉजिकल गुणों यानी उसके प्रवाह व्यवहार का अध्ययन कर रही हैं। परियोजना में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिक डॉ. अंकुश कुमार भी तकनीकी सहयोग दे रहे हैं। शोधार्थी रचिता सिंह और अभिषेक सिंह कृत्रिम चंद्र मिट्टी के संश्लेषण और विकास में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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आईआईटी (बीएचयू) के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने इस उपलब्धि को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा कि देश की अंतरिक्ष सफलताएं अब केवल चंद्रमा तक पहुंचने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वहां आत्मनिर्भर और टिकाऊ आधारभूत संरचना विकसित करने की दिशा में भी वैज्ञानिक अनुसंधान तेजी से आगे बढ़ रहा है। उनके अनुसार भविष्य में चंद्रमा पर उपलब्ध संसाधनों का स्थानीय स्तर पर उपयोग ही स्थायी मानव उपस्थिति स्थापित करने और मिशनों की लागत कम करने का सबसे प्रभावी माध्यम होगा। उन्होंने कहा कि आईआईटी (बीएचयू) इस राष्ट्रीय लक्ष्य को साकार करने के लिए अत्याधुनिक और बहु-विषयक अनुसंधान को लगातार आगे बढ़ा रहा है।

प्रो. कमलेश कुमार सिंह ने बताया कि चंद्रयान-3 की सफलता के बाद चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र को लेकर पूरी दुनिया में वैज्ञानिक रुचि बढ़ी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वहां जल-बर्फ सहित कई महत्वपूर्ण खनिज और संसाधन मौजूद हैं, जिनका उपयोग भविष्य के मानव मिशनों में किया जा सकता है। इसी सोच के तहत यह शोध इन-सीटू रिसोर्स यूटिलाइजेशन (आईएसआरयू) की अवधारणा पर आधारित है। इसका उद्देश्य चंद्रमा पर उपलब्ध संसाधनों का वहीं उपयोग कर निर्माण सामग्री तैयार करना है, ताकि पृथ्वी से उपकरण और भारी सामग्री भेजने की आवश्यकता कम हो सके।

शोधकर्ताओं के अनुसार चंद्रमा की सतह रेगोलिथ नामक महीन परत से ढकी होती है, जो अरबों वर्षों तक सूक्ष्म उल्कापिंडों की टक्करों से बनी है। इस परत में प्लाजियोक्लेज, ओलिविन, पाइरोक्सीन, इल्मेनाइट, क्रोमाइट, क्वार्ट्ज और सिलिका जैसे महत्वपूर्ण खनिज मौजूद होते हैं। इन्हीं गुणों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने विशेष प्रकार की मिट्टी, चट्टानों और रासायनिक तत्वों का उपयोग कर कृत्रिम लूनर सॉइल सिमुलेंट तैयार किया। इसके बाद बॉल मिलिंग तकनीक से इसे अत्यंत महीन और समरूप कणों में बदला गया, जिससे यह 3डी प्रिंटिंग के लिए उपयुक्त बन सके।

वर्तमान में शोध दल इस कृत्रिम चंद्र मिट्टी से तैयार विशेष स्लरी आधारित इंक के प्रवाह गुणों का अध्ययन कर रहा है। साथ ही रेगोलिथ से धातुओं के निष्कर्षण की तकनीक विकसित करने पर भी कार्य जारी है। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि भविष्य में इसी तकनीक की मदद से चंद्रमा पर आश्रय स्थल, लैंडिंग पैड, सड़कें और अन्य आवश्यक संरचनाएं स्थानीय संसाधनों से तैयार की जा सकेंगी। इससे अंतरिक्ष अभियानों की लागत में उल्लेखनीय कमी आएगी और लंबे समय तक चलने वाले चंद्र अभियानों की व्यवहारिकता भी बढ़ेगी।

शोधकर्ताओं का मानना है कि जैसे-जैसे भारत मानव अंतरिक्ष मिशनों और चंद्रमा पर स्थायी उपस्थिति की दिशा में आगे बढ़ेगा, आईआईटी (बीएचयू) में विकसित की जा रही यह स्वदेशी तकनीक भविष्य के चंद्र आवास मिशनों, अंतरिक्ष निर्माण तकनीकों और गहन अंतरिक्ष अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यह उपलब्धि न केवल भारतीय वैज्ञानिक क्षमता का प्रमाण है, बल्कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को भी नई मजबूती प्रदान करती है।

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