हरिशयनी एकादशी : चार माह के लिए योग निद्रा में चले जाएंगे भगवान विष्णु, 119 दिनों का चातुर्मास, 20 नवंबर तक नहीं होंगे मांगलिक कार्य
वाराणसी। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की हरिशयनी (देवशयनी) एकादशी शनिवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। अनुराधा नक्षत्र में श्रद्धालु भगवान श्रीहरि विष्णु का व्रत रखकर विधि-विधान से पूजन-अर्चन करेंगे। इसी दिन से भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने की धार्मिक मान्यता है और इसके साथ ही लगभग 119 दिनों तक चलने वाले चातुर्मास का शुभारंभ होगा। चातुर्मास के आरंभ के साथ ही विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ समेत सभी प्रमुख मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाएगा। अब देवउठनी एकादशी, 20 नवंबर को भगवान विष्णु के जागरण के बाद ही शुभ कार्य दोबारा प्रारंभ होंगे।
हिंदू धर्म में हरिशयनी एकादशी का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार वे चार माह तक राजा बलि के पास पाताल लोक में निवास करते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है, जो साधना, संयम, तप, भक्ति और आत्मचिंतन का सर्वोत्तम समय माना जाता है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्याधर्म विज्ञान संकाय के प्रोफेसर विनय कुमार पांडे ने बताया कि हरिशयनी एकादशी से चातुर्मास का शुभारंभ होता है। इस दिन साधु-संत, वैष्णव आचार्य और गृहस्थ सभी व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं। चातुर्मास के दौरान साधु-संत संकल्प लेकर एक ही स्थान पर निवास करते हैं और जप, तप, ध्यान, सत्संग, कथा एवं धार्मिक अनुष्ठानों में अपना समय व्यतीत करते हैं। गृहस्थों के लिए भी यह काल अधिक से अधिक पूजा-पाठ, व्रत, दान-पुण्य और सत्संग करने का श्रेष्ठ अवसर माना गया है।
20 नवंबर तक नहीं होंगे शुभ मांगलिक कार्य
भगवान विष्णु के शयनकाल में विवाह, तिलक, मुंडन, यज्ञोपवीत (जनेऊ), गृह प्रवेश, नए भवन का शुभारंभ और अन्य मांगलिक संस्कार नहीं किए जाते। देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु के जागरण के बाद तुलसी विवाह के साथ पुनः शुभ कार्यों का आरंभ होगा। इस वर्ष देवउठनी एकादशी 20 नवंबर को पड़ेगी।
साधना का सर्वश्रेष्ठ काल माना जाता है चातुर्मास
धर्मशास्त्रों में चातुर्मास को आध्यात्मिक उन्नति का विशेष काल बताया गया है। मान्यता है कि इस दौरान किए गए जप, तप, दान, व्रत, ध्यान, भजन-कीर्तन और धार्मिक ग्रंथों के श्रवण का फल सामान्य दिनों की अपेक्षा कई गुना अधिक प्राप्त होता है। इसी कारण देशभर के मठों, आश्रमों और मंदिरों में चार माह तक श्रीमद्भागवत कथा, विष्णु पुराण, श्रीशिव महापुराण, रामचरितमानस पाठ, सत्संग और भजन-कीर्तन के विशेष आयोजन होते हैं।
साधु-संत करते हैं एक स्थान पर निवास
चातुर्मास में संन्यासी और साधु-संत भ्रमण छोड़कर एक ही स्थान पर निवास करते हैं। इस अवधि में वे आध्यात्मिक साधना, शास्त्र अध्ययन, प्रवचन और भक्तों को धर्मोपदेश देने का कार्य करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे सनातन धर्म की महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में गिना जाता है।
चातुर्मास में खानपान का भी विशेष महत्व
धार्मिक परंपरा के अनुसार चातुर्मास के चारों महीनों में भोजन संबंधी कुछ विशेष नियमों का पालन करने की सलाह दी जाती है। सावन में हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन नहीं किया जाता। भाद्रपद में दही और उससे बने पदार्थों से परहेज किया जाता है। आश्विन में दूध का सेवन सीमित या त्यागने की परंपरा है। कार्तिक में प्याज, लहसुन, तामसिक भोजन तथा विशेष रूप से चना और मसूर जैसी कुछ दालों से परहेज करने की मान्यता है। धार्मिक विद्वानों का कहना है कि इन नियमों के पीछे आध्यात्मिक अनुशासन के साथ-साथ ऋतु परिवर्तन के दौरान स्वास्थ्य संरक्षण का भी वैज्ञानिक पक्ष माना जाता है।
मंदिरों में विशेष तैयारियां
वाराणसी के प्रमुख वैष्णव मंदिरों में हरिशयनी एकादशी के अवसर पर विशेष पूजन, आरती, भजन-कीर्तन और विष्णु सहस्रनाम पाठ की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। श्रद्धालु सुबह से व्रत रखकर भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और तुलसी का पूजन करेंगे तथा चातुर्मास के दौरान नियमित पूजा, जप और दान-पुण्य का संकल्प लेंगे।
धर्माचार्यों का कहना है कि हरिशयनी एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि आत्मसंयम, आध्यात्मिक जागरण और ईश्वर के प्रति समर्पण का पर्व है। चातुर्मास के इन चार महीनों में श्रद्धा, सेवा, साधना और सत्संग के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बना सकता है।

