ज्ञानवापी विवाद : सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता पहल से पहले मुस्लिम पक्ष ने बनाई दूरी, हिंदू पक्ष बोला- ज्ञानवापी मंदिर है, कब्जा छोड़े मुस्लिम पक्ष
वाराणसी। ज्ञानवापी विवाद में सुप्रीम कोर्ट की ओर से आपसी सहमति के जरिए समाधान निकालने की पहल को बड़ा झटका लगा है। अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता पहल के तहत प्रस्तावित "समाधान समारोह" में किसी भी स्तर पर शामिल नहीं होगी। कमेटी का कहना है कि यह पहल बाध्यकारी नहीं है और संगठन ने इसमें भाग न लेने का निर्णय लिया है। दूसरी ओर हिंदू पक्ष ने भी अपने पुराने रुख को दोहराते हुए कहा है कि ज्ञानवापी मूल रूप से मंदिर है और मुस्लिम पक्ष को वहां से कब्जा छोड़ देना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञानवापी, मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह तथा संभल की शाही जामा मस्जिद से जुड़े विवादों का सौहार्दपूर्ण समाधान तलाशने के उद्देश्य से संबंधित पक्षों को मध्यस्थता प्रक्रिया में शामिल होने का सुझाव दिया था। इसी क्रम में वाराणसी में 14 जुलाई को जिला न्यायालय के मध्यस्थता केंद्र में लोक अदालत की प्रक्रिया के तहत पक्षकारों को बुलाया गया है। यह पहल सुप्रीम कोर्ट के "समाधान समारोह" अभियान का हिस्सा मानी जा रही है, जिसका उद्देश्य लंबित विवादों को आपसी सहमति से सुलझाने का प्रयास करना है।

अंजुमन इंतजामिया मसाजिद ने जारी किया आधिकारिक पत्र
सोमवार को अंजुमन इंतजामिया मसाजिद, वाराणसी की ओर से संयुक्त सचिव एस.एम. यासीन के हस्ताक्षर से जारी पत्र में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा विभिन्न न्यायालयों में लंबित वादों के शीघ्र निस्तारण के लिए "समाधान समारोह" का आयोजन किया जा रहा है। पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि ज्ञानवापी मस्जिद से संबंधित विवाद को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है।
हालांकि कमेटी ने अपने पत्र में साफ कहा कि यह आमंत्रण बाध्यकारी नहीं है। इसलिए अंजुमन इंतजामिया मसाजिद ने निर्णय लिया है कि वह इस समाधान समारोह में किसी भी स्तर पर शामिल नहीं होगी। कमेटी का कहना है कि विवाद का समाधान न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही होना चाहिए।
एस.एम. यासीन बोले- यह केवल आमंत्रण है, आदेश नहीं
अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के संयुक्त सचिव एस.एम. यासीन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की यह पहल केवल एक आमंत्रण है, कोई बाध्यकारी आदेश नहीं। उन्होंने कहा कि कमेटी ने विचार-विमर्श के बाद निर्णय लिया है कि वह इस मध्यस्थता प्रक्रिया में भाग नहीं लेगी और अदालत में कानूनी लड़ाई जारी रखेगी।
हिंदू पक्ष ने भी नहीं बदला अपना रुख
उधर, ज्ञानवापी मामले में हिंदू पक्ष के अधिवक्ता मदन मोहन यादव ने कहा कि हिंदू पक्ष का स्पष्ट मत है कि ज्ञानवापी मूल रूप से मंदिर है। उनका कहना है कि मुस्लिम पक्ष वहां अतिक्रमणकारी है और उसे परिसर से अपना कब्जा छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे मूल ज्योतिर्लिंग के स्थान पर भव्य काशी विश्वनाथ मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होगा।
दोनों पक्षों ने मध्यस्थता से बनाई दूरी
दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट की पहल का उद्देश्य आपसी सहमति से समाधान निकालना था, लेकिन अब तक सामने आए बयानों से स्पष्ट है कि दोनों पक्ष अपने-अपने पुराने रुख पर कायम हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार हिंदू और मुस्लिम, दोनों ही पक्षों ने अदालत के बाहर समझौते की संभावना से फिलहाल इनकार किया है और न्यायालय में ही अंतिम निर्णय चाहते हैं।
अब 14 जुलाई की प्रक्रिया पर निगाहें
ऐसे में 14 जुलाई को वाराणसी के मध्यस्थता केंद्र में प्रस्तावित प्रक्रिया औपचारिकता तक सीमित रहने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया और आगे होने वाली सुनवाई पर निर्भर करेगा। सुप्रीम कोर्ट की यह पहल फिलहाल विवाद के शांतिपूर्ण समाधान की कोशिश के रूप में देखी जा रही है, लेकिन दोनों पक्षों के रुख के बाद इस दिशा में आगे बढ़ना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

