काशी से वडनगर को तोहफा, मेहसाणा के हैंडलूम उत्पाद को जीआई टैग दिलाने के लिए आवेदन, डॉ. रजनीकांत ने की पहल 

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जीआई मैन डॉ. रजनीकांत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह जिले की पारंपरिक बुनाई को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में उठाया कदम

 

18वीं शताब्दी से जुड़ी बुनाई परंपरा के संरक्षण और संवर्धन की पहल, नाबार्ड व ईडीआईआई गांधीनगर के सहयोग से तैयार हुआ आवेदन

 

वाराणसी। भारत की समृद्ध पारंपरिक विरासत और ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को साकार करने की दिशा में काशी से गुजरात तक एक महत्वपूर्ण पहल हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह जिले मेहसाणा के पारंपरिक हथकरघा उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (जीआई) पहचान दिलाने के लिए पहली बार आवेदन किया गया है। ‘मेहसाणा हैंडलूम प्रोडक्ट’ के नाम से तैयार इस आवेदन की पहल काशी के जीआई विशेषज्ञ एवं पद्मश्री सम्मानित डॉ. रजनीकांत ने की है। इसे उत्तर गुजरात की सदियों पुरानी बुनाई परंपरा के संरक्षण, संवर्धन और व्यापक पहचान की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में सुशासन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर काशी की ओर से इसे उनके गृह क्षेत्र के लिए एक विशेष उपहार के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। डॉ. रजनीकांत के अनुसार, नाबार्ड और ईडीआईआई गांधीनगर के सहयोग से इस ऐतिहासिक पहल को आगे बढ़ाया गया है। इसका उद्देश्य मेहसाणा के पारंपरिक बुनकरों के पीढ़ीगत कौशल को संरक्षित करना और स्थानीय हथकरघा उत्पादों को विशिष्ट पहचान दिलाना है।

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वडनगर और उत्तर गुजरात की बुनाई परंपरा को मिलेगा संरक्षण
गुजरात के मेहसाणा जिले की पारंपरिक हथकरघा बुनाई उत्तर गुजरात की समृद्ध वस्त्र एवं शिल्प विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका सांस्कृतिक संबंध ऐतिहासिक नगर वडनगर और आसपास के बुनकर क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है। उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, वडनगर लंबे समय से व्यापार, संस्कृति और पारंपरिक शिल्प का प्रमुख केंद्र रहा है।

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मेहसाणा के रिदरोल, नारदीपुर और आसपास के गांवों में पारंपरिक बुनाई के साथ कलात्मक ब्रोकेड वस्त्र तैयार करने की परंपरा रही है। वर्ष 1961 की जनगणना संबंधी ऐतिहासिक रिपोर्टों में मेहसाणा क्षेत्र के कुटीर उद्योगों में हथकरघा बुनाई का उल्लेख मिलता है। वडनगर का नाम पारंपरिक मशरू वस्त्र निर्माण के केंद्रों में भी दर्ज बताया गया है।

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सूती चादरों से लेकर ब्रोकेड तक, बुनकरों के कौशल को मिलेगी पहचान
मेहसाणा जिले के बुनकर आज भी सूती चादरें, बेडकवर, तौलिए, तकिए के गिलाफ और विभिन्न रंगों एवं डिजाइनों के हथकरघा वस्त्र तैयार करते हैं। स्थानीय बुनाई में प्लेन और ट्विल जैसी तकनीकों के साथ मल्टी-ट्रेडल तकनीक का भी उपयोग किया जाता है। वस्त्र मंत्रालय के हथकरघा संबंधी अभिलेखों में मेहसाणा के लींच गांव के बुनकरों द्वारा इन तकनीकों के इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है।

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जीआई आवेदन के माध्यम से इन उत्पादों की भौगोलिक पहचान स्थापित करने, पारंपरिक निर्माण तकनीकों को सुरक्षित रखने और बुनकरों को अपने उत्पादों की विशिष्टता के आधार पर बाजार में पहचान दिलाने की दिशा में काम किया जा सकेगा।

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25 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों तक पहुंची जीआई अभियान की पहल
पद्मश्री डॉ. रजनीकांत देश में पारंपरिक उत्पादों को जीआई पहचान दिलाने के अभियान से जुड़े प्रमुख विशेषज्ञों में शामिल हैं। उनके अनुसार, देश के 25 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लगभग 650 उत्पादों के लिए जीआई आवेदन की पहल की जा चुकी है। गुजरात के पारंपरिक उत्पादों, शिल्प, हथकरघा और आदिवासी विरासत को भी इस अभियान से जोड़ा गया है। उनके मुताबिक, गुजरात के 15 उत्पादों के लिए आवेदन किए गए हैं और आठ उत्पादों को जीआई स्वीकृति मिल चुकी है। इनमें सूरत डायमंड भी शामिल है।

मेहसाणा हैंडलूम प्रोडक्ट का आवेदन इसी व्यापक प्रयास की अगली कड़ी है। इसका लक्ष्य स्थानीय कारीगरों की परंपरा को दस्तावेजीकृत कर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना और गुजरात की पारंपरिक वस्त्र विरासत को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की संभावनाएं बढ़ाना है।

काशी से शुरू हुई पहल, विरासत को बचाने का संकल्प
डॉ. रजनीकांत ने कहा कि मेहसाणा की हथकरघा परंपरा केवल वस्त्र निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थानीय इतिहास, संस्कृति और बुनकर समुदाय के पीढ़ियों से चले आ रहे कौशल की पहचान है। जीआई के माध्यम से इस विरासत को संरक्षित करने और आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।

काशी से शुरू हुई यह पहल गुजरात की पारंपरिक शिल्प विरासत को नई पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आवेदन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद निर्धारित परीक्षण और मूल्यांकन के आधार पर ही उत्पाद को जीआई पंजीकरण मिल सकेगा।

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