जीआई टैग से बनारस के जरी-जरदोजी को मिली नई पहचान, हजारों कारीगरों को मिला नया रोजगार 

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वाराणसी। अपनी सांस्कृतिक विरासत, हस्तकला और पारंपरिक शिल्प के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध वाराणसी की बनारसी जरदोजी कला को जीआई टैग मिलने के बाद नई वैश्विक पहचान मिली है। इस पारंपरिक कला ने न केवल बनारस की ऐतिहासिक शिल्प परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया है, बल्कि हजारों कारीगरों और बुनकर परिवारों के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता के नए रास्ते भी खोले हैं।

जीआई क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले और पद्मश्री से सम्मानित डॉ. रजनीकांत ने बताया कि बनारसी जरदोजी को लगभग छह वर्ष पहले जीआई टैग मिला था। इसके बाद इस कला की मांग देश-विदेश में तेजी से बढ़ी है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में वाराणसी में करीब 20 हजार लोग जरी-जरदोजी के कार्य से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं।

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उन्होंने बताया कि बनारसी जरदोजी की खासियत इसकी पारंपरिक तकनीक और बेहद बारीक कारीगरी है। इस शिल्प में मुख्य रूप से दो तरह की तकनीकों जरी और जरदोजी का उपयोग किया जाता है। सोने और चांदी से मढ़े विशेष तारों के जरिए तैयार की जाने वाली यह कला पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान रखती है।

डॉ. रजनीकांत के अनुसार इस क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है। जरदोजी कार्य में लगभग 35 से 40 प्रतिशत महिलाएं सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं, जबकि इससे जुड़े अन्य सहायक कार्यों में 60 प्रतिशत से अधिक महिलाओं की भागीदारी है। इससे बड़ी संख्या में महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं।

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उन्होंने बताया कि बनारसी जरदोजी की मांग केवल भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बैज, एंबलम, मोनोग्राम और राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े विशेष डिजाइन वाराणसी के कारीगर तैयार करते हैं। इतना ही नहीं, वेटिकन सिटी में पोप के विशेष परिधानों के निर्माण में भी बनारस की जरदोजी कला का उपयोग किया जाता है, जो शहर के लिए गर्व का विषय है।

बनारसी जरदोजी का उपयोग केवल परिधानों तक सीमित नहीं है। भगवानों की पोशाक, मुकुट, धार्मिक सजावट, फ्रेम, दरगाहों और कब्रों पर की जाने वाली विशेष कढ़ाई में भी इसका व्यापक इस्तेमाल होता है। इसकी कलात्मकता और शिल्प की बारीकी इसे अन्य कढ़ाई कलाओं से अलग बनाती है।

वाराणसी के अलावा आसपास के कई जिलों के शिल्पी और बुनकर भी इस परंपरागत कला से जुड़े हुए हैं। जीआई टैग मिलने के बाद इस कला को अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई पहचान और बेहतर अवसर प्राप्त हुए हैं। इससे हजारों परिवारों की आजीविका मजबूत हुई है और बनारसी शिल्प को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में भी मदद मिल रही है।

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