केदारनाथ के समान पुण्यदायी है काशी का गौरी केदारेश्वर धाम, स्वयंभू शिवलिंग में विराजते हैं शिव-पार्वती और विष्णु-लक्ष्मी, जानिये अद्भुत महात्म्य

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महादेव को लगता है खिचड़ी का भोग, सावन में गंगा पहुंचती हैं बाबा की चौखट तक

स्कंद पुराण के काशी खंड में मिलता है मंदिर का उल्लेख, सावन में गंगा स्नान के बाद जलाभिषेक के लिए उमड़ते हैं श्रद्धालु

केदार घाट के समीप स्थित है प्राचीन गौरी केदारेश्वर मंदिर, ऋषि मान्धाता की भक्ति से जुड़ी है बाबा को खिचड़ी भोग लगाने की परंपरा

स्कंद पुराण के काशी खंड में मंदिर का उल्लेख मिलता है, सावन में मंदिर के चौखट तक पहुंचती हैं गंगा 

वर्ष 1932 से चली आ रही यादव और चंद्रवंशी समाज की जलाभिषेक की परंपरा, मंदिर में प्रतिदिन विभिन्न पहरों में होती है विशेष आरती 

वाराणसी। काशी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है और यहां स्थित प्रत्येक प्राचीन शिवालय अपनी विशिष्ट मान्यता और परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इन्हीं में केदार घाट के समीप स्थित गौरी केदारेश्वर धाम का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि यहां बाबा केदारेश्वर के दर्शन और पूजन से हिमालय स्थित केदारनाथ धाम के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। सावन के महीने में मंदिर की धार्मिक महत्ता और बढ़ जाती है और देशभर से शिवभक्त यहां दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं।

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गौरी केदारेश्वर मंदिर का सबसे अनूठा आकर्षण यहां स्थापित स्वयंभू शिवलिंग है। धार्मिक मान्यता के अनुसार शिवलिंग दो भागों में विभक्त दिखाई देता है। एक भाग में भगवान शिव और माता पार्वती के शिव-शक्त्यात्मक स्वरूप तथा दूसरे भाग में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के हरिहरात्मक स्वरूप की मान्यता है। इसी विशेषता के कारण यह मंदिर काशी के अन्य शिवालयों से अलग पहचान रखता है।

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स्कंद पुराण में मिलता है उल्लेख
मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण के काशी खंड में भी मिलता है। प्राचीन मान्यताओं में इसे ‘काशी केदार’ कहा गया है। कालांतर में शिवलिंग के विशिष्ट स्वरूप के कारण इसका नाम गौरी केदारेश्वर पड़ा। धार्मिक परंपराओं में इसे शिव-शक्ति तथा विष्णु-लक्ष्मी के संयुक्त स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।

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ऋषि मान्धाता की भक्ति से जुड़ा खिचड़ी भोग
गौरी केदारेश्वर मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपराओं में बाबा को खिचड़ी का भोग लगाना शामिल है। धार्मिक कथा के अनुसार ऋषि मान्धाता भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और प्रतिदिन हिमालय जाकर शिव-पार्वती को खिचड़ी का भोग अर्पित करते थे। एक बार अस्वस्थ होने के कारण वह हिमालय नहीं जा सके। उनकी प्रार्थना और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव काशी में गौरी केदारेश्वर स्वरूप में प्रकट हुए और उनका खिचड़ी का भोग स्वीकार किया।

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इसी मान्यता के चलते आज भी बाबा को खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। श्रद्धालु गंगाजल, दूध और बेलपत्र अर्पित करने के साथ खिचड़ी का भोग लगाकर अपनी मनोकामना बाबा के चरणों में रखते हैं।

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चार युगों से जुड़ा है शिवलिंग का स्वरूप
धार्मिक मान्यता के अनुसार स्वयंभू शिवलिंग चारों युगों में अलग-अलग स्वरूप में पूजित रहा। सतयुग में नवरत्नमय, त्रेतायुग में स्वर्णमय, द्वापर में रजतमय और कलियुग में शिलामय स्वरूप की मान्यता है। वर्तमान में यहां शिलामय स्वयंभू शिवलिंग की पूजा होती है। इसे माता अन्नपूर्णा की कृपा से भी जोड़ा जाता है और खिचड़ी के भोग को अन्न एवं समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

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सावन में बढ़ जाती है श्रद्धालुओं की भीड़
सावन में मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। गंगा स्नान के बाद भक्त बाबा का जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक करते हैं। मंदिर परिसर में हर-हर महादेव के जयघोष के साथ ‘गौरी केदारेश्वराभ्यां नमः’ का जाप गूंजता है। इस दौरान गंगा का जलस्तर बढ़ने पर मां गंगा के बाबा की चौखट तक पहुंचने की धार्मिक मान्यता भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है।

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1932 से चली आ रही जलाभिषेक परंपरा
गौरी केदारेश्वर मंदिर से यादव और चंद्रवंशी समाज की विशेष परंपरा भी जुड़ी है। मान्यता के अनुसार सावन के पहले सोमवार को समाज के लोग यहां से गंगाजल लेकर काशी विश्वनाथ सहित अन्य शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं। यह परंपरा वर्ष 1932 से लगातार चली आ रही है। मंदिर में पूजा-अर्चना और आरती की भी विशिष्ट परंपरा है। प्रतिदिन विभिन्न पहरों में आरती होती है। भोर में मंगला आरती, सुबह महानैवेद्य या भोग आरती, अपराह्न आरती, प्रदोषकालीन आरती और रात्रि में शयन आरती के साथ दैनिक पूजन क्रम पूरा होता है।

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गंगा, केदार घाट और काशी की प्राचीन गलियों के बीच स्थित गौरी केदारेश्वर धाम आज भी सदियों पुरानी आस्था और परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है। सावन में घंटियों की ध्वनि, गंगा की लहरों और हर-हर महादेव के जयघोष के बीच यह मंदिर काशी की शिवभक्ति का प्रमुख केंद्र बन जाता है।

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