तिलक की प्रेरणा से काशी में शुरू हुआ गणेशोत्सव, 129 साल से कायम है परंपरा

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1898 में ब्रह्माघाट के सरदार आंग्रे के बाड़े से हुई थी सार्वजनिक आयोजन की शुरुआत

महाराष्ट्र की परंपरा का काशी में अनूठा संगम, छह दिन धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम और सातवें दिन विसर्जन

रिपोर्ट : ओमकार नाथ

वाराणसी। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की प्रेरणा से काशी में शुरू हुआ सार्वजनिक गणेशोत्सव आज भी मराठी परंपरा और धार्मिक विधि-विधान के साथ आगे बढ़ रहा है। ब्रह्माघाट स्थित सरदार आंग्रे के बाड़े में वर्ष 1898 में शुरू हुई इस परंपरा को श्रीकाशी गणेशोत्सव समिति 129 वर्षों से जीवंत बनाए हुए है। सात दिवसीय आयोजन में छह दिनों तक धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम होते हैं, जबकि सातवें दिन गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

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करीब 350 वर्ष पुराने सरदार आंग्रे के बाड़े का संबंध पेशवा परिवार से रहा है। सरदार आंग्रे, पेशवा बाजीराव के परिवार के प्रमुख सरदारों में शामिल थे। काशी में मराठी और गुजराती समाज की बड़ी आबादी के बीच यह परिसर लंबे समय से धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है।

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सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना का बना माध्यम
देश की आजादी से करीब पांच दशक पहले शुरू हुए सार्वजनिक गणेशोत्सव के पीछे लोगों को एक मंच पर जोड़ने और सामाजिक चेतना मजबूत करने की भावना थी। उस दौर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनजागरण के लिए लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव को सार्वजनिक आयोजन का स्वरूप दिया था। काशी में भी धार्मिक आयोजन के माध्यम से समाज को एकजुट करने की पहल हुई।

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श्रीकाशी गणेशोत्सव समिति के अध्यक्ष सुनील चितले के अनुसार, वर्ष 1898 में काशी महाराष्ट्र स्कूल बोर्ड की ओर से सरदार आंग्रे के बाड़े में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की गई थी। इसके बाद पांच लोगों ने मिलकर श्रीकाशी गणेशोत्सव समिति की स्थापना की। इनमें राजाराम मेहेंदव्ठे, काशीनाथ रामचंद्र भागवत, राजाराम गणेश टोककर, गणेश चिमणा थत्थे और रामचंद्र नारायण गंगाजव्ठी शामिल थे।

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तिलक, मालवीय और हरिऔध भी पहुंचे
काशी के इस ऐतिहासिक गणेशोत्सव में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के अलावा महामना पंडित मदनमोहन मालवीय और अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' जैसे प्रमुख व्यक्तित्व भी पहुंचे। करपात्री जी महाराज, शिव प्रसाद गुप्त और शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती सहित अनेक संतों और विद्वानों की उपस्थिति भी इस आयोजन से जुड़ी रही है।

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एक ही परिवार बनाता है गणेश प्रतिमा
समिति के सदस्य आलोक के अनुसार, यहां आज भी गणेश पूजा पुरानी मराठी परंपरा के अनुसार होती है। गणेश प्रतिमा बनाने की जिम्मेदारी एक ही परिवार निभाता आ रहा है। प्रतिमा पारंपरिक शैली में तैयार की जाती है। पूजा के दौरान मराठी समाज की विशेष पद्यगान परंपरा का भी पालन किया जाता है।

आज भी जीवंत है आंग्रे के बाड़े का इतिहास
समिति के सदस्य भगत वात्सल्य जनार्दन शास्त्री कुन्ते ने बताया कि सरदार आंग्रे काशी क्षेत्र की व्यवस्था देखते थे। जिस स्थान पर आज गणेश प्रतिमा स्थापित होती है, वहां सरदार आंग्रे बैठा करते थे। रिद्धि-सिद्धि के स्थान पर उनके मंत्री बैठते थे, जबकि ऊपरी हिस्से में सिपाही पहरा देते थे। उन्होंने बताया कि वर्ष 1962 में समिति के पदाधिकारियों ने इस ऐतिहासिक परिसर को खरीद लिया था। आज भी यहां आयोजित होने वाला गणेशोत्सव काशी की मराठी विरासत, धार्मिक परंपरा और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक बना हुआ है।

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