भगवान जगन्नाथ को प्रतिदिन अर्पित हो रहा ताजा आयुर्वेदिक काढ़ा, महाप्रसाद पाने उमड़ रहे श्रद्धालु

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वाराणसी। अस्सी स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर में भगवान श्रीजगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के अनसर (एकांतवास) की परंपरा श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जा रही है। स्नान पूर्णिमा के बाद शुरू हुए इस विशेष काल के पांच दिन पूरे हो चुके हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में भगवान अस्वस्थ रहते हैं, इसलिए उनके स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रतिदिन आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से तैयार किया गया ताजा काढ़ा अर्पित किया जाता है। मंदिर की परंपरा के अनुसार भगवान को कभी भी बासी काढ़ा नहीं चढ़ाया जाता।

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मंदिर के प्रधान पुजारी राधेश्याम पांडेय ने बताया कि प्रतिदिन नए सिरे से आयुर्वेदिक औषधियों और पारंपरिक जड़ी-बूटियों से काढ़ा तैयार किया जाता है। विधिवत पूजा-अर्चना के बाद यही काढ़ा महाप्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और भगवान की सेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

सुबह से मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की अच्छी-खासी भीड़ उमड़ रही। वाराणसी के अलावा चंदौली, मिर्जापुर, भदोही और आसपास के अन्य जनपदों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु महाप्रसाद स्वरूप काढ़ा ग्रहण करने पहुंचे। श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीजगन्नाथ से परिवार की सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और मंगलमय जीवन की कामना की। मंदिर परिसर पूरे दिन भक्ति और श्रद्धा के वातावरण से सराबोर रहा। भजन-कीर्तन, हरिनाम संकीर्तन और "जय श्रीजगन्नाथ" के जयघोष से पूरा परिसर गूंजता रहा।

अनसर काल के दौरान भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होते, क्योंकि इस अवधि में भगवान एकांतवास में रहते हैं। इसके बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमी नहीं दिखाई देती। भक्त महाप्रसाद के रूप में काढ़ा ग्रहण कर स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं और भगवान के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना करते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार स्नान पूर्णिमा पर विशेष अभिषेक के बाद भगवान श्रीजगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद कुछ दिनों तक उन्हें एकांत में रखकर विशेष सेवा, उपचार और आयुर्वेदिक औषधियों से तैयार काढ़ा अर्पित किया जाता है। अनसर काल समाप्त होने के बाद भगवान पुनः भक्तों को दर्शन देते हैं और इसके बाद रथयात्रा सहित अन्य धार्मिक आयोजनों का क्रम शुरू होता है।

श्रीजगन्नाथ मंदिर की यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि सनातन परंपरा और आयुर्वेद के गहरे संबंध का भी प्रतीक मानी जाती है। यही कारण है कि प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर काढ़ा महाप्रसाद ग्रहण कर आध्यात्मिक संतोष का अनुभव कर रहे हैं।

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