मैकाले की शिक्षा से आगे बढ़कर भारतीय ज्ञान परंपरा अपनाने पर जोर, धर्मसंघ में जुटे देशभर के शिक्षाविद, करपात्री जी के शिक्षण चिंतन पर किया विमर्श 

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वाराणसी। धर्मसम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के 119वें प्राकट्योत्सव के छठे दिन रविवार को दुर्गाकुंड स्थित श्रीधर्मसंघ शिक्षा मंडल में ‘समग्र शिक्षा एवं धर्मसम्राट की दृष्टि’ विषय पर अखिल भारतीय शास्त्र संगोष्ठी सह कुलपति सम्मेलन आयोजित किया गया। धर्मसंघ पीठाधीश्वर स्वामी शंकरदेव चैतन्य ब्रह्मचारी के सानिध्य में आयोजित सम्मेलन में करीब डेढ़ दर्जन विश्वविद्यालयों के कुलपतियों समेत देशभर के शिक्षाविदों ने भारतीय ज्ञान परंपरा, शिक्षा के उद्देश्य और स्वामी करपात्री जी के शिक्षण चिंतन पर विचार-विमर्श किया।

सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था की अपनी समृद्ध और वैज्ञानिक परंपरा रही है। स्वामी करपात्री जी महाराज के शिक्षण चिंतन की उपेक्षा कर मैकाले की शिक्षा पद्धति को अपनाना भारतीय शिक्षा व्यवस्था का दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष रहा। वक्ताओं ने कहा कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति भारतीय ज्ञान परंपरा और गौरवशाली शिक्षण व्यवस्था को पुनः स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।

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संगोष्ठी की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा आयोग के अध्यक्ष एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने की। उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्र परंपरा में संवाद को महत्व दिया गया है, प्रतिद्वंद्विता को नहीं। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ने विद्यार्थियों को एक सीमित दायरे में बांध दिया है, इसके लिए विद्यार्थी नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े लोग जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में ज्ञान जहां से भी मिले, उसे ग्रहण करने की सीख दी गई है। इसका उदाहरण भगवान श्रीराम द्वारा लक्ष्मण को रावण से ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेजने की परंपरा में मिलता है।

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प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि स्वामी करपात्री जी महाराज का मत था कि विज्ञान और तकनीक का उपयोग समाज के हित में होना चाहिए। समाज को विज्ञान और तकनीक के अनुरूप ढालने के बजाय विज्ञान और तकनीक को समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने कहा कि ज्ञान अर्जित करने से भी अधिक जरूरी उसका संरक्षण और व्यापक प्रसार है। उन्होंने नालंदा जैसे प्राचीन ज्ञान केंद्रों के विनाश का उल्लेख करते हुए कहा कि ज्ञान की परंपरा को सुरक्षित रखने के साथ उसे समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाना आवश्यक है। स्वामी करपात्री जी महाराज भी ज्ञान के व्यापक प्रसार के पक्षधर थे।

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वरिष्ठ शिक्षाविद एवं पूर्व कुलपति प्रो. एडीएन बाजपेयी ने कहा कि भारतीय और पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था में मूलभूत अंतर है। पश्चिमी परंपरा में ज्ञान के सृजन पर जोर दिया जाता है, जबकि भारतीय परंपरा में ज्ञान एक प्रवाहमान व्यवस्था है। आवश्यकता पड़ने पर भारतीय विद्वानों ने शास्त्रार्थ के माध्यम से ज्ञान में संशोधन और परिष्कार का मार्ग अपनाया।

लाल बहादुर शास्त्री केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने कहा कि स्वामी करपात्री जी महाराज ने शिक्षा को ज्ञान और विज्ञान के रूप में देखा। सत्य के समागम और सत्य शिक्षा के माध्यम से सद्बुद्धि तथा श्रेष्ठ व्यक्तित्व का निर्माण संभव है। उन्होंने कहा कि गुरु की भूमिका केवल पुस्तक पढ़ाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह विद्यार्थी को जीवन की समग्र शिक्षा प्रदान करता है। सम्मेलन का शुभारंभ स्वामी शंकरदेव चैतन्य ब्रह्मचारी ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। संयोजन धर्मसंघ महामंत्री पं. जगजीतन पांडेय ने किया। स्वागत प्रो. रामनारायण द्विवेदी और राजमंगल पांडेय ने किया, जबकि संचालन प्रो. विनय पांडेय ने किया। 

सम्मेलन में उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय हरिद्वार के कुलपति प्रो. रमाकांत पांडेय, राम मनोहर लोहिया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनोज दीक्षित, संस्कृत भारती नई दिल्ली के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. रमेश कुमार पांडेय, बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र राय, महर्षि पाणिनि संस्कृत विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलगुरु प्रो. शिवशंकर मिश्र, जेएनयू नई दिल्ली के रेक्टर प्रो. बृजेश पांडेय, पूर्व कुलपति प्रो. साहित्य कुमार नाहर, आगरा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अरविंद कुमार दीक्षित, पूर्व कुलपति जीसीआर जायसवाल और भारतीय जन संचार संस्थान नई दिल्ली के निदेशक प्रो. राकेश उपाध्याय समेत दो दर्जन से अधिक शिक्षाविदों ने विचार रखे।

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