दीपावली की तैयारी : दिन-रात काम में जुटे कुम्हार, मिट्टी के तरह-तरह के दीयों से सजेगा बाजार, वोकल फॉर लोकल की मुहिम होगी साकार

WhatsApp Channel Join Now

कुम्हार बस्ती में गूंज रही चाक की आवाज, चार महीने पहले से शुरू कर दी थी दीये और पूजन सामग्री बनाने की तैयारी

पीढ़ियों से चली आ रही कला को सहेज रहीं रेणु देवी, मिट्टी के दीयों से लेकर गगरी, पुरवा और हड़िया तक बना रहीं, आधुनिकता के दौर में नई पीढ़ी का घट रहा रुझान

वाराणसी। दीपावली की रात घर-आंगन को रोशन करने वाले मिट्टी के दीयों के पीछे कुम्हार परिवारों की महीनों की मेहनत छिपी होती है। त्योहार नजदीक आते ही फुलवरिया की कोहरार बस्ती में चाक की रफ्तार तेज हो गई है। यहां महिलाएं दिन-रात मिट्टी को आकार देकर दीये और पारंपरिक बर्तन तैयार करने में जुटी हैं। किसी के हाथ मिट्टी गूंथ रहे हैं तो कोई चाक पर दीयों को आकार दे रहा है। भट्ठियों में पककर तैयार हो रहे मिट्टी के उत्पाद अब बाजार में पहुंचने लगे हैं।

2113

कुम्हार बस्ती की रेणु देवी भी अपने परिवार के साथ पुश्तैनी हुनर को आगे बढ़ा रही हैं। उनके हाथों से तैयार होने वाले मिट्टी के दीये, गगरी, पुरवा, हड़िया, ढकनी, परई और भड़ैया आज भी परंपरा और लोक संस्कृति की पहचान बने हुए हैं। दीपावली के लिए दीये और पूजन सामग्री तैयार करने का काम उन्होंने करीब चार महीने पहले ही शुरू कर दिया था। अब त्योहार की मांग को देखते हुए उत्पादन तेज कर दिया है।

मिट्टी से दीये तक का सफर, कई चरणों में तैयार होता है सामान
रेणु देवी बताती हैं कि मिट्टी के बर्तन बनाना जितना आसान दिखाई देता है, इसमें उतनी ही मेहनत लगती है। सबसे पहले मिट्टी लाकर उसे कूटना और गूंथना पड़ता है। इसके बाद चाक पर मिट्टी रखकर हाथों से मनचाहा आकार दिया जाता है। तैयार दीयों और बर्तनों को धूप में सुखाया जाता है। फिर भट्ठी में पकाने के बाद वे बिक्री के लिए तैयार होते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में समय और श्रम दोनों लगते हैं। दीपावली के कई महीने पहले से परिवार के सभी सदस्य इस काम में जुट जाते हैं, ताकि त्योहार के समय बाजार की मांग पूरी की जा सके।

123

नई पीढ़ी का घट रहा रुझान, फिर भी नहीं छोड़ा पुश्तैनी काम
बदलते दौर में कुम्हारी का पारंपरिक व्यवसाय कई चुनौतियों से जूझ रहा है। युवा पीढ़ी का रुझान आधुनिक शिक्षा, सरकारी नौकरी और दूसरे रोजगारों की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में मिट्टी के बर्तन बनाने की कला धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है। इसके बावजूद रेणु देवी इस हुनर को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि नई पीढ़ी भले ही इस काम में ज्यादा रुचि न दिखाए, लेकिन उनकी कोशिश रहेगी कि यह परंपरा चलती रहे।

123

परंपरा बचाने के लिए मिट्टी के दीये अपनाएं
दीपावली पर बाजार से मिट्टी के दीये खरीदना केवल घर को रोशन करने का माध्यम नहीं है, बल्कि उन कारीगर परिवारों की मेहनत को सम्मान देना भी है, जो पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं। स्थानीय कुम्हारों से दीये खरीदकर लोग भारतीय परंपरा, संस्कृति और स्थानीय हस्तशिल्प को संबल दे सकते हैं।

BK Pathak
BK Pathak

21588 Articles

Beerkeshwar Pathak Journalist Beerkeshwar Pathak, who entered the field of journalism in 2015, has nearly a decade of experience in print and digital media. He holds a postgraduate diploma in journalism and has established his reputation through reporting at prestigious media outlets like Amar Ujala, Hindustan, and Dainik Jagran. He has a special interest and expertise in reporting on political and social issues, news analysis, and editing, along with eventful news. He currently serves as an editor at Live VNS, a leading digital news platform in Varanasi. In this role, he is contributing to reshaping digital journalism and delivering important information to readers through factual and reliable news. Factual investigation of news and effective editing are key aspects of his journalism.

Share this story