बंगाल में बढ़ी राम दरबार और बुलडोजर मॉडल की मांग, काशी की काष्ठ कला को मिला नया बाजार

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वाराणसी। विश्व प्रसिद्ध काष्ठ कला इन दिनों एक बार फिर चर्चा में है। पश्चिम बंगाल से अचानक बढ़ी राम दरबार, श्रीराम मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर के मॉडल और बुलडोजर प्रतिमाओं की मांग ने काशी के कारीगरों के चेहरे पर नई मुस्कान ला दी है। कारीगरों का कहना है कि पहले पश्चिम बंगाल से केवल लकड़ी के खिलौनों और सजावटी सामानों के ऑर्डर आते थे, लेकिन पिछले कुछ दिनों में धार्मिक प्रतिमाओं और प्रतीकात्मक मॉडलों की मांग में तेजी आई है।

डेढ़ सप्ताह में बंगाल से बढ़े ऑर्डर
काष्ठ कला से जुड़ी उद्यमी शुभी अग्रवाल बताती हैं कि बीते एक से डेढ़ सप्ताह के भीतर पश्चिम बंगाल, खासकर कोलकाता से लगातार फोन और ऑर्डर आने शुरू हुए हैं। लोगों द्वारा श्रीराम की मूर्तियां, राम दरबार, बुलडोजर मॉडल और मंदिरों के मिनी मॉडल की विशेष मांग की जा रही है। उन्होंने बताया कि इससे पहले बंगाल से इस तरह के ऑर्डर कभी नहीं आए थे। वहां से मुख्य रूप से चिड़ियों, बच्चों के खिलौनों, मिरर फ्रेम और सजावटी वस्तुओं की ही मांग होती थी।

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घरों और प्रतिष्ठानों की साज-सज्जा के लिए डिमांड
कारीगरों का कहना है कि अब बंगाल में लोग अपने घरों और प्रतिष्ठानों में धार्मिक प्रतिमाएं सजाने के लिए काशी की काष्ठ कला को प्राथमिकता दे रहे हैं। राम दरबार और मंदिरों के मॉडल को खासतौर पर सजावट और उपहार के रूप में पसंद किया जा रहा है। इसके साथ ही बुलडोजर के लकड़ी से बने मॉडल भी ट्रेंड में हैं और उनकी मांग तेजी से बढ़ रही है।

बंगाल में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के प्रति बढ़ी रुचि
शुभी अग्रवाल के अनुसार बंगाल चुनाव के दूसरे चरण के बाद से इन ऑर्डरों में तेजी देखी गई। उन्होंने कहा कि लोगों में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के प्रति रुचि बढ़ी है, जिसका सीधा असर काशी की काष्ठ कला पर दिखाई दे रहा है। कोलकाता के कई दुकानदारों द्वारा श्रीराम मंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर के मिनी मॉडल की मांग की जा रही है। इन उत्पादों को घरों में सजावट और उपहार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।

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ऑर्डर पूरा करने को कर रहे लगातार काम 
इस बढ़ती मांग ने काशी के कारीगरों को आर्थिक रूप से भी मजबूती दी है। महिला कारीगर मीनू प्रजापति बताती हैं कि इस समय राम दरबार और श्रीराम की मूर्तियों के ऑर्डर इतने अधिक हैं कि कई महिलाओं को लगातार काम करना पड़ रहा है। छोटे मॉडल तैयार करने में कम से कम एक सप्ताह का समय लगता है, जबकि बड़े और बारीक डिजाइन वाले राम दरबार को तैयार करने में 20 से 25 दिन तक लग जाते हैं। उन्होंने बताया कि इन प्रतिमाओं में बेहद महीन और पारंपरिक नक्काशी का काम किया जाता है, जिसके लिए कुशल कारीगरों की आवश्यकता होती है।

सदियों पुरानी है काशी की काष्ठ कला
काशी की काष्ठ कला सदियों पुरानी परंपरा मानी जाती है। यह कला मुख्य रूप से लकड़ी के खिलौनों, धार्मिक प्रतिमाओं और सजावटी वस्तुओं के निर्माण के लिए प्रसिद्ध है। यहां के कारीगर गूलर, कदम और शीशम जैसी लकड़ियों पर नक्काशी कर पारंपरिक और आधुनिक डिजाइन तैयार करते हैं। समय के साथ इस कला में बदलाव आया है और अब धार्मिक प्रतीकों, मंदिर मॉडलों और उपहार सामग्रियों की भी बड़ी मांग होने लगी है।

जीआई टैग के बाद मिली नई पहचान
कारीगरों का कहना है कि एक समय ऐसा था जब यह कला धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रही थी। आय कम होने के कारण नई पीढ़ी इस पेशे से दूरी बना रही थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सरकारी प्रोत्साहन, प्रदर्शनियों और जीआई टैग मिलने के बाद इस कला को नई पहचान मिली है। बनारस के लकड़ी के खिलौनों को मिला जीआई टैग इसकी मौलिकता और गुणवत्ता का प्रमाण माना जाता है।

विदेशों में भी काशी के खिलौनों की डिमांड
कारीगरों के अनुसार अब देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी काशी की काष्ठ कला की मांग बढ़ रही है। धार्मिक प्रतिमाओं, मंदिर मॉडलों और सजावटी उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता ने इस पारंपरिक कला को नया बाजार दिया है। इससे न केवल कारीगरों की आय बढ़ रही है, बल्कि महिला कारीगरों और छोटे उद्यमियों को भी रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं।


काशी की काष्ठ कला आज केवल एक पारंपरिक हस्तशिल्प नहीं रह गई है, बल्कि यह शहर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है। राम दरबार, मंदिर मॉडल और धार्मिक प्रतीकों की बढ़ती मांग ने यह साबित कर दिया है कि बदलते समय में भी पारंपरिक भारतीय कला और संस्कृति के प्रति लोगों का आकर्षण लगातार बढ़ रहा है।

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