देवशयनी एकादशी से शुरू होगा चातुर्मास, चार माह तक साधना, सत्संग और वैदिक अनुष्ठानों से गूंजेंगे मठ-आश्रम
वाराणसी। देवशयनी एकादशी के साथ शुक्रवार से चार माह तक चलने वाले चातुर्मास का शुभारंभ होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवोत्थान एकादशी) तक योगनिद्रा में ही रहते हैं। इसी अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। इस दौरान देश के विभिन्न राज्यों से साधु-संत, दंडी संन्यासी और वैदिक परंपरा से जुड़े आचार्य काशी के मठों और आश्रमों में प्रवास कर जप, तप, स्वाध्याय और धर्म साधना करेंगे। वहीं श्रद्धालु भी व्रत, दान, पूजा-पाठ और सत्संग के माध्यम से आध्यात्मिक साधना में सहभागी बनेंगे।
धार्मिक परंपरा के अनुसार देवशयनी एकादशी से विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन सहित अन्य मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। संत-महात्मा भी भ्रमण छोड़कर एक ही स्थान पर निवास करते हुए साधना, शास्त्र अध्ययन और धर्म प्रचार में समय व्यतीत करते हैं। काशी में इस अवधि के दौरान आध्यात्मिक गतिविधियां अपने चरम पर रहती हैं।
चातुर्मास के लिए उत्तर भारत के अलावा दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और गोवा सहित कई राज्यों से संतों का आगमन होगा। आंध्र प्रदेश के नारायण भारती स्वामी आंध्राश्रम में चातुर्मास करेंगे। वहीं गोवा से अमृतानंद स्वामी कांची मठ पहुंचेंगे। पूर्वाम्नाय श्री दक्षिणामूर्ति मठ में राजेश चैतन्य ब्रह्मचारी और वानप्रस्थ संत हेमचंद्र झा चार माह तक साधना करेंगे।
इसके अतिरिक्त पातालपुरी मठ, सुमेरु पीठ, रामजानकी मठ, पंचायती अखाड़ा, मुमुक्षु भवन, टेकरा मठ, गौड़ीय मठ, साधुवेला आश्रम, श्री आदि शंकराचार्य मठ, काठियावाड़ी मठ और देवरहवा बाबा आश्रम सहित अनेक धार्मिक संस्थानों में संतों का प्रवास रहेगा। कोंकणी परंपरा के संत संमेंद्र तीर्थ भी 23 जुलाई को काशी पहुंचेंगे और ब्रह्माघाट स्थित लगभग 400 वर्ष पुराने काशी मठ में चातुर्मास करेंगे।
इस वर्ष चारों शंकराचार्यों में से कोई भी चातुर्मास के लिए काशी नहीं आएगा। ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती छत्तीसगढ़ के बेमेतरा में, जबकि द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती राजस्थान के पथमेड़ा में चातुर्मास करेंगे। अन्य दोनों शंकराचार्य भी अपने-अपने मूल पीठों में ही प्रवास करेंगे। हालांकि काशी स्थित श्रीविद्या मठ, श्रृंगेरी मठ और पूर्वाम्नाय श्री दक्षिणामूर्ति मठ सहित विभिन्न शाखा पीठों में परंपरानुसार संतों का निवास और धार्मिक आयोजन होंगे।
पूर्वाम्नाय श्री दक्षिणामूर्ति मठ के प्रधान दंडी संन्यासी स्वामी वनवैभवारण्य सरस्वती के अनुसार चातुर्मास संतों के लिए कठोर अनुशासन, आत्मसंयम और साधना का विशेष काल है। इस दौरान एक ही स्थान पर रहकर जप, तप, ध्यान, वेद-अध्ययन और इष्टदेव की आराधना की जाती है। यात्रा करना वर्जित माना जाता है।
चार माह तक काशी के विभिन्न मठों और आश्रमों में श्रीमद्भागवत कथा, रामचरितमानस, शिव महापुराण एवं विष्णु पुराण का पाठ, भजन-कीर्तन, वेदपाठ, सत्संग और प्रवचन आयोजित होंगे। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इन आयोजनों में भाग लेकर आध्यात्मिक लाभ अर्जित करेंगे। धार्मिक मान्यता है कि चातुर्मास में किए गए जप, तप, दान और सेवा का पुण्य कई गुना अधिक फलदायी होता है। ऐसे में एक बार फिर काशी का वातावरण संतों की उपस्थिति, वैदिक अनुष्ठानों और भक्ति की अविरल धारा से भक्तिमय हो उठेगा।

