स्वदेशी तकनीक से आत्मनिर्भर बना बरेका, 11,259 रेल इंजन बनाकर रचा इतिहास
99 प्रतिशत स्वदेशीकरण के दम पर दुनिया के 11 देशों तक वाराणसी में बने इंजनों की आपूर्ति, वित्तीय वर्ष 2025-26 में 572 इंजनों का उत्पादन कर बनाया नया कीर्तिमान
1959 में निर्माण की प्रक्रिया शुरू, अगस्त 1961 में संस्थान अस्तित्व में आया
3 जनवरी 1964 को बना था पहला रेल इंजन, पूर्व में डीरेका के नाम से जाना जाता था संस्थान
रिपोर्ट- ओमकार नाथ
वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी निर्माण के संकल्प को साकार करने में काशी स्थित बनारस रेल इंजन कारखाना (बरेका) महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कभी रेल इंजनों के निर्माण में विदेशी कलपुर्जों पर निर्भर रहने वाला यह संस्थान आज स्वदेशी तकनीक और घरेलू विनिर्माण क्षमता के दम पर नई ऊंचाइयां छू रहा है। बरेका अब तक 11,259 रेल इंजनों का निर्माण कर चुका है। लगभग 99 प्रतिशत स्वदेशीकरण के साथ यहां तैयार इंजन भारतीय रेल की जरूरतों को पूरा करने के साथ विदेशों में भी भारत की तकनीकी क्षमता का परिचय दे रहे हैं।
बरेका की यह उपलब्धि छह दशक से अधिक समय से जारी तकनीकी विकास, कर्मचारियों की मेहनत और उत्पादन क्षमता में निरंतर वृद्धि का परिणाम है। संस्थान से अब तक करीब 182 डीजल रेल इंजनों का निर्यात 11 देशों में किया जा चुका है। इनमें अफ्रीकी देश मोजाम्बिक भी शामिल है।
99 प्रतिशत स्वदेशीकरण से मजबूत हुई आत्मनिर्भरता
बरेका के जनसंपर्क अधिकारी राजेश कुमार के अनुसार, रेल इंजन निर्माण में संस्थान ने लगभग 99 प्रतिशत स्वदेशीकरण हासिल किया है। इससे विदेशी निर्भरता कम करने के साथ घरेलू उद्योगों, तकनीकी विशेषज्ञों और स्थानीय विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा मिला है। इंजन निर्माण में देश में विकसित और निर्मित कलपुर्जों का व्यापक इस्तेमाल भारत की औद्योगिक आत्मनिर्भरता को मजबूत कर रहा है।
1964 में बना पहला इंजन, अब हजारों का आंकड़ा पार
बरेका की आधारशिला 23 अप्रैल 1956 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने रखी थी। संस्थान की स्थापना की प्रक्रिया 1959 में शुरू हुई और अगस्त 1961 में यह औपचारिक रूप से अस्तित्व में आया। शुरुआत में इसका नाम डीजल लोकोमोटिव वर्क्स (डीरेका) था, जिसे बाद में बनारस रेल इंजन कारखाना नाम दिया गया।
तीन जनवरी 1964 को यहां पहला रेल इंजन बनकर तैयार हुआ। इसके बाद संस्थान ने उत्पादन और तकनीकी विकास के क्षेत्र में लगातार प्रगति की। वर्ष 2023 में 10,000वें और वर्ष 2025 में 11,000वें रेल इंजन के निर्माण का आंकड़ा पार करने के बाद अब कुल उत्पादन 11,259 तक पहुंच गया है।
एक साल में 572 इंजन बनाकर बनाया रिकॉर्ड
वित्तीय वर्ष 2025-26 बरेका के लिए उपलब्धियों से भरा रहा। इस दौरान 572 रेल इंजनों का निर्माण किया गया, जो पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में करीब 20 प्रतिशत अधिक बताया गया है। इस अवधि में 14 अमृत भारत रेल इंजनों का निर्माण भी पूरा किया गया। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए रेलवे बोर्ड से लगभग 166 रेल इंजनों के निर्माण के आदेश मिलने के बाद आगामी उत्पादन गतिविधियों को गति मिलने की उम्मीद है।
मोजाम्बिक समेत 11 देशों तक पहुंचा काशी का हुनर
बरेका में निर्मित रेल इंजन अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना चुके हैं। संस्थान से करीब 182 डीजल इंजनों का निर्यात 11 देशों में किया गया है। जनसंपर्क अधिकारी के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2025-26 में मोजाम्बिक को 10 रेल इंजनों का निर्यात किया गया। विदेशी बाजारों तक भारतीय इंजनों की पहुंच देश की विनिर्माण क्षमता और तकनीकी दक्षता को दर्शाती है।
डीजल से इलेक्ट्रिक इंजन में रूपांतरण भी बड़ी उपलब्धि
बरेका ने पुराने एचएचपी श्रेणी के डब्ल्यूडीजी-4 डीजल रेल इंजनों को डब्ल्यूएजी-11 विद्युत रेल इंजनों में परिवर्तित करने का काम भी किया है। इसके अलावा वर्ष 2002 में 1,000वें विद्युत रेल इंजन का निर्माण, वित्तीय वर्ष 2021-22 में 367 इंजनों का उत्पादन और वर्ष 2022 में एक महीने में 52 विद्युत रेल इंजन बोगी सेट का निर्माण इसकी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल हैं। उत्पादन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए संस्थान को रेल मंत्रालय से पुरस्कार भी मिले हैं। संलयन वेल्डिंग के लिए आईएसओ 3834 प्रमाणन इसकी गुणवत्ता संबंधी उपलब्धियों में शामिल है।
काशी की औद्योगिक पहचान को मिली नई मजबूती
बरेका की उपलब्धियां केवल इंजनों की संख्या तक सीमित नहीं हैं। स्वदेशी तकनीक, कुशल मानव संसाधन, गुणवत्ता और निरंतर नवाचार के जरिए संस्थान भारतीय रेल की जरूरतों को पूरा करने के साथ देश की औद्योगिक आत्मनिर्भरता में योगदान दे रहा है। काशी में निर्मित इंजनों का दूसरे देशों तक पहुंचना इस बात का प्रमाण है कि भारत रेल परिवहन और भारी उद्योग के क्षेत्र में अपनी वैश्विक पहचान मजबूत कर रहा है।

