बनारस से बड़ी ख़बर: मधु किश्वर पर कसेगा क़ानूनी शिकंजा! वाराणसी कोर्ट ने जारी किया ये सख्त आदेश

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वाराणसी। सोशल मीडिया पर कथित भ्रामक और आपत्तिजनक सामग्री फैलाने के मामले में अकादमिक व लेखक मधु किश्वर की कानूनी मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। वाराणसी के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) ने अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी की ओर से दाखिल प्रार्थना-पत्र पर संज्ञान लेते हुए इसे औपचारिक परिवाद (Complaint) के रूप में दर्ज करने का महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। इसके साथ ही, अदालत ने मामले को कानूनी जांच के योग्य मानते हुए आगामी 24 सितंबर 2026 को वादी का बयान दर्ज करने की तिथि भी निर्धारित कर दी है।

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अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी (फाइल फोटो)

BNSS की धाराओं के तहत आदेश: 24 सितंबर को दर्ज होगा बयान
23 जुलाई 2026 को पारित अपने इस आदेश में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173(4) के तहत प्रस्तुत आवेदन का बारीकी से परीक्षण किया। उपलब्ध दस्तावेजों और प्रारंभिक तथ्यों का अवलोकन करने के बाद कोर्ट ने इसे परिवाद के तौर पर दर्ज करने का फैसला सुनाया। अब इस मामले में शिकायतकर्ता का बयान BNSS की धारा 223 के तहत 24 सितंबर 2026 को अदालत के समक्ष दर्ज किया जाएगा।

संवैधानिक पदों पर टिप्पणी और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप
यह शिकायत 'दी बनारस बार एसोसिएशन' के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और भारतीय जनता पार्टी विधि प्रकोष्ठ (काशी क्षेत्र) के संयोजक शशांक शेखर त्रिपाठी की ओर से दर्ज कराई गई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि सोशल मीडिया के सत्यापित हैंडल से लगातार ऐसी सामग्री पोस्ट की गई, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था, सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता को खतरा पैदा हो सकता था। शिकायत में संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाने, न्यायिक प्रक्रिया पर भ्रामक टिप्पणियां करने और समाज में वैमनस्य फैलाने का जिक्र है। इसके समर्थन में संबंधित पोस्ट्स, कानूनी नोटिस, ईमेल और व्हाट्सएप संदेशों के दस्तावेज कोर्ट में पेश किए गए हैं।

"अभिव्यक्ति की आजादी के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी": शिकायतकर्ता की दो टूक
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए शशांक शेखर त्रिपाठी ने स्पष्ट किया कि उनकी यह कानूनी लड़ाई किसी व्यक्तिगत रंजिश के कारण नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर फैलती झूठी और भ्रामक जानकारी पर अंकुश लगाने के लिए है। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की आजादी देता है, लेकिन इसके साथ सत्य, जिम्मेदारी और कानूनी मर्यादाओं का पालन करना भी उतना ही अनिवार्य है। त्रिपाठी ने भरोसा जताया कि अदालत के सामने रखे गए मजबूत साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष न्याय होगा और सच सामने आएगा।

कोर्ट में दिग्गज वकीलों की फौज: कानूनी टीम ने रखी दमदार दलीलें
अदालत में इस संवेदनशील मामले को मजबूती से आगे बढ़ाने में शिकायतकर्ता की लीगल टीम ने अहम भूमिका निभाई। वरिष्ठ अधिवक्ता जितेंद्र तिवारी और राजेश त्रिवेदी के नेतृत्व में अधिवक्ता आशुतोष शुक्ला, आशुतोष सक्सेना और दीपक वर्मा ने कोर्ट के सामने प्रभावी और निरंतर पैरवी की। सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक सामग्री के खिलाफ वाराणसी कोर्ट का यह कदम कानूनी प्रक्रिया को गति देने की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।

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