69 साल बाद खुलेगा बीएचयू का ऐतिहासिक संदूक, 2800 वर्ष पुराने कंकाल से उजागर होंगे प्राचीन काशी के अनजाने रहस्य

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वाराणसी। काशी के प्राचीन इतिहास और गंगा घाटी की सभ्यता को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के पुरातत्व विभाग में पिछले 69 वर्षों से सुरक्षित रखा गया लगभग 2800 वर्ष पुराना मानव कंकाल अब पहली बार आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों की मदद से अध्ययन के लिए खोला जाएगा। माना जा रहा है कि इस शोध से प्राचीन काशी के लोगों की जीवनशैली, खान-पान, आनुवंशिक संरचना और सामाजिक परिवेश से जुड़े कई महत्वपूर्ण रहस्यों से पर्दा उठ सकता है।

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यह कंकाल वर्ष 1957 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा राजघाट में किए गए उत्खनन के दौरान मिला था। लगभग छह फीट लंबे इस मानव कंकाल को संरक्षित रखने के लिए विशेष संदूक में सुरक्षित कर बीएचयू के पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया था। तब से यह संदूक बंद था और अब करीब सात दशक बाद इसे वैज्ञानिक अध्ययन के लिए खोला जाएगा।

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बीएचयू के पुरातत्व विभागाध्यक्ष प्रो. एमपी अहिरवार के निर्देशन में यह प्रक्रिया पूरी की जाएगी। अध्ययन में बीएचयू के जीन विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे तथा हैदराबाद स्थित सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स (सीडीएफडी) के वैज्ञानिक डॉ. प्रज्वल प्रताप सिंह सहित विशेषज्ञों की टीम शामिल होगी। पूरी प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के अनुरूप संचालित की जाएगी, ताकि हजारों वर्ष पुराने अवशेषों को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे।

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वैज्ञानिक कंकाल के विभिन्न हिस्सों से नमूने लेकर रेडियोकार्बन डेटिंग, डीएनए विश्लेषण और आइसोटोप परीक्षण करेंगे। रेडियोकार्बन डेटिंग के माध्यम से कंकाल की वास्तविक आयु और उसके कालखंड की पुष्टि की जाएगी। वहीं डीएनए परीक्षण से यह जानने का प्रयास होगा कि उस समय काशी क्षेत्र में रहने वाले लोगों की आनुवंशिक संरचना कैसी थी और उनका संबंध किन प्राचीन मानव समूहों से रहा होगा।

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इसके अलावा ऑक्सीजन और कार्बन आइसोटोप विश्लेषण के जरिए वैज्ञानिक उस दौर के लोगों के खान-पान, जलवायु और भौगोलिक परिवेश का भी अध्ययन करेंगे। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि प्राचीन काशी के निवासी किस प्रकार का भोजन करते थे, उनका जीवन स्तर कैसा था और वे स्थानीय थे या किसी अन्य क्षेत्र से आकर बसे थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस अध्ययन के निष्कर्षों की तुलना हड़प्पा सभ्यता और भारतीय उपमहाद्वीप की अन्य प्राचीन सभ्यताओं से भी की जा सकती है। इससे गंगा घाटी की सभ्यता के विकास, उसकी विशिष्टताओं और अन्य समकालीन संस्कृतियों से उसके संबंधों पर नई वैज्ञानिक जानकारी सामने आने की संभावना है।

बीएचयू के निदेशन में होने वाला यह अध्ययन भारतीय पुरातत्व में आधुनिक विज्ञान के बढ़ते उपयोग का भी महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। डीएनए तकनीक, रेडियोकार्बन डेटिंग और आइसोटोप विश्लेषण जैसी आधुनिक विधियां उन सवालों के जवाब तलाशने में मदद करेंगी, जिनका उत्तर दशकों पहले उपलब्ध नहीं था।

करीब 69 वर्षों तक इतिहास की परतों में सुरक्षित यह संदूक अब केवल एक पुरातात्विक धरोहर नहीं, बल्कि प्राचीन काशी की अनकही कहानी का वैज्ञानिक दस्तावेज बनने जा रहा है। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि इस अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष गंगा घाटी की प्राचीन सभ्यता, उसके लोगों और उनके जीवन के बारे में नई ऐतिहासिक और वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराएंगे, जो भारतीय इतिहास और पुरातत्व के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकती है।

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