बीएचयू की उपलब्धि: आधुनिक प्रजनन तकनीकों से स्वदेशी गोवंश संरक्षण की पहल, भ्रूण स्थानांतरण से गाय ने बछिया को दिया जन्म
वाराणसी। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के अंतर्गत बीएचयू द्वारा स्वदेशी गोवंश के संरक्षण और आनुवंशिक उन्नयन के क्षेत्र में निरंतर उल्लेखनीय प्रगति की जा रही है। बीएचयू के राजीव गांधी दक्षिण परिसर (आरजीएससी), बरकछा, मिर्जापुर स्थित कृषि विज्ञान संस्थान की फैकल्टी ऑफ वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेज (एफवीएएस) इस दिशा में वैज्ञानिक अनुसंधान और आधुनिक प्रजनन तकनीकों के प्रभावी उपयोग के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।
एफवीएएस द्वारा विशेष रूप से स्वदेशी गंगातीरी और साहीवाल पशु नस्लों के संरक्षण, संवर्धन और उत्पादकता बढ़ाने पर कार्य किया जा रहा है। नववर्ष 2026 के अवसर पर इस परियोजना को एक बड़ी सफलता मिली है। दिनांक 1 जनवरी 2026 को एफवीएएस डेयरी फार्म में एक स्वदेशी सरोगेट गाय ने भ्रूण स्थानांतरण तकनीक के माध्यम से 24.5 किलोग्राम वजन की स्वस्थ साहीवाल बछिया को जन्म दिया। इस प्रक्रिया में लिंग-परिक्षित वीर्य का उपयोग किया गया, जिससे मादा बछिया के जन्म की संभावना को सुनिश्चित किया जा सका। यह परियोजना के तहत साहीवाल नस्ल की छठी सफल संतति है, जो इस तकनीक की सफलता और विश्वसनीयता को दर्शाती है।
यह उपलब्धि बीएचयू में सहायक प्रजनन तकनीकों के सफल अनुप्रयोग और उन्नत पशु प्रजनन अनुसंधान में हो रही निरंतर प्रगति को रेखांकित करती है। नववर्ष के पहले दिन प्राप्त यह सफलता स्वदेशी पशुधन संसाधनों के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को और मजबूत बनाती है।
नवजात बछिया का निरीक्षण फैकल्टी ऑफ वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेज के अधिष्ठाता प्रो. अमित राज गुप्ता तथा राजीव गांधी दक्षिण परिसर के प्रभारी प्रोफेसर प्रो. बी. एम. एन. कुमार द्वारा किया गया। दोनों वरिष्ठ शिक्षाविदों ने डेयरी फार्म की प्रबंधन व्यवस्था की सराहना की और इस उपलब्धि से जुड़े वैज्ञानिकों एवं तकनीकी टीम का उत्साहवर्धन किया। कृषि विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. यू. पी. सिंह ने भी स्वदेशी पशु नस्लों के संरक्षण के क्षेत्र में फैकल्टी द्वारा की जा रही निरंतर उपलब्धियों की प्रशंसा की।
इस परियोजना का क्रियान्वयन डॉ. मनीष कुमार (प्रधान अन्वेषक) के नेतृत्व में किया जा रहा है, जबकि डॉ. कौस्तुभ किशोर सराफ और डॉ. अजीत सिंह सह-प्रधान अन्वेषक के रूप में सहयोग प्रदान कर रहे हैं। फैकल्टी द्वारा ओवम पिक-अप (ओपीयू) और इन-विट्रो भ्रूण उत्पादन (आईवीईपी) जैसी अगली पीढ़ी की उन्नत प्रजनन तकनीकों को चरणबद्ध रूप से अपनाया जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इन वैज्ञानिक तकनीकों का योजनाबद्ध विस्तार विंध्य क्षेत्र के दुग्ध उत्पादक कृषकों तक किए जाने से सतत डेयरी विकास को गति मिलेगी। इससे ग्रामीण आय में वृद्धि, दुग्ध उत्पादन में सुधार तथा खाद्य और पोषण सुरक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान संभव होगा। आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना के अनुरूप पशुधन क्षेत्र में नवाचार आधारित यह पहल समावेशी विकास की दिशा में एक सशक्त कदम मानी जा रही है।

