बीएचयू में मृतदाता अंगदान की प्रक्रिया होगी आसान, किडनी और कॉर्निया प्रत्यारोपण से शुरुआत की तैयारी

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नौ सदस्यीय विशेषज्ञ समिति करेगी ब्रेन डेथ का चिकित्सीय और कानूनी प्रमाणीकरण, परिजनों की काउंसलिंग के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं की भी ली जाएगी मदद

आईसीयू में हर महीने सामने आते हैं तीन-चार संभावित ब्रेन डेथ के मामले, सालभर में 40 से अधिक मामलों में अंगदान की संभावना

पूर्वांचल के मरीजों को मिलेगी स्थानीय स्तर पर प्रत्यारोपण सुविधा की उम्मीद

वाराणसी। बीएचयू के चिकित्सा विज्ञान संस्थान ने मृतदाता अंगदान (कैडेवरिक ऑर्गन डोनेशन) की प्रक्रिया को आसान, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने की पहल की है। सर सुंदरलाल अस्पताल और ट्रामा सेंटर में ब्रेन डेड मरीजों के अंगदान के लिए चिकित्सीय जांच और कानूनी प्रमाणीकरण की व्यवस्था को व्यवस्थित किया जाएगा। इसके लिए संस्थान के निदेशक प्रो. एसएन संखवार ने नौ सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की है। समिति की निगरानी में संभावित ब्रेन डेथ के मामलों की पहचान, निर्धारित मानकों के अनुसार पुष्टि और अंगदान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। इस पहल से पूर्वांचल के उन मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें अंग प्रत्यारोपण के लिए दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों के चिकित्सा संस्थानों पर निर्भर रहना पड़ता है।


छह विभागों के विशेषज्ञ समिति में शामिल
मानव अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 और 2014 के नियमों के तहत ब्रेन डेथ की पुष्टि और अंगदान के लिए निर्धारित चिकित्सीय एवं कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करना अनिवार्य है। गठित समिति में एनेस्थीसियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, जनरल सर्जरी, जनरल मेडिसिन और बाल चिकित्सा समेत विभिन्न विभागों के वरिष्ठ चिकित्सकों को शामिल किया गया है। समिति निर्धारित मानकों के अनुरूप प्रमाणीकरण और प्रक्रिया की निगरानी करेगी, ताकि अनावश्यक देरी से बचा जा सके।


पहले किडनी और कॉर्निया प्रत्यारोपण पर जोर
बीएचयू में प्रत्यारोपण सुविधा चरणबद्ध तरीके से विकसित करने की तैयारी है। पहले चरण में किडनी और कॉर्निया प्रत्यारोपण शुरू करने पर जोर दिया जा रहा है। इसके लिए यूरोलॉजी और नेफ्रोलॉजी की टीमों को तैयार किया जा रहा है। आगे चलकर लिवर और हृदय जैसे जटिल अंगों के प्रत्यारोपण की सुविधा विकसित करने की योजना है। अनुमान के अनुसार, बीएचयू में किडनी प्रत्यारोपण का खर्च करीब डेढ़ से दो लाख रुपये हो सकता है। हालांकि वास्तविक लागत मरीज की स्थिति और उपचार की जरूरतों पर निर्भर करेगी।


हर महीने तीन-चार संभावित मामले
एनेस्थीसियोलॉजी विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर आरके दुबे के अनुसार, ट्रामा सेंटर और अस्पताल की अन्य गहन चिकित्सा इकाइयों में करीब 100 बिस्तरों की क्षमता है। यहां हर महीने तीन से चार ऐसे मामले सामने आते हैं, जिनमें ब्रेन डेथ की स्थिति बन सकती है। इस आधार पर सालभर में 40 से अधिक संभावित मामलों में अंगदान की संभावना हो सकती है। हालांकि, वास्तविक अंगदान चिकित्सीय और कानूनी मानकों तथा परिजनों की सहमति पर निर्भर करेगा।


परिजनों की काउंसलिंग पर विशेष जोर
ब्रेन डेथ की स्थिति में परिवार मानसिक तनाव से गुजरता है। ऐसे में अंगदान के महत्व और प्रक्रिया की जानकारी संवेदनशीलता से देना जरूरी है। इसके लिए चिकित्सकों के साथ सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद लेने की योजना है। जरूरत पड़ने पर धार्मिक और सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित लोगों का सहयोग भी लिया जा सकता है, ताकि भ्रांतियां दूर हों और परिजन सोच-समझकर निर्णय ले सकें।


पूर्वांचल के मरीजों को मिलेगी नई उम्मीद
बीएचयू में मृतदाता अंगदान और प्रत्यारोपण की व्यवस्था विकसित होने से क्षेत्र के जरूरतमंद मरीजों को स्थानीय स्तर पर उपचार उपलब्ध कराने की संभावनाएं बढ़ेंगी। विशेषज्ञ समिति के गठन के बाद ब्रेन डेथ की पहचान, प्रमाणीकरण, काउंसलिंग और अंगदान की प्रक्रिया को व्यवस्थित ढांचे में लाने की तैयारी है।

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