बीएचयू-एंएसआई संगोष्ठी में प्राचीन डीएनए शोध पर मंथन, आधुनिक लैब और सहयोग को बताया अनिवार्य

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वाराणसी। बीएचयू और Anthropological Survey of India (एंएसआई) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के द्वितीय दिवस पर प्राचीन डीएनए (aDNA) अनुसंधान की दिशा और चुनौतियों पर व्यापक चर्चा हुई। कार्यक्रम की शुरुआत भव्य स्वागत समारोह से हुई, जिसमें देशभर से आए वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया।

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इस अवसर पर पद्मश्री के थांगराज का विशेष स्वागत किया गया। इसके बाद एंएसआई के निदेशक बीवी शर्मा ने ‘फाउंडेशन टू फ्रंटियर्स: रिफ्रेमिंग द रिसर्च प्रायोरिटीज इन बायोलॉजिकल एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 1945 से एंएसआई जैविक मानवशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है और वर्तमान समय में बहु-संस्थागत सहयोग की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। उनके अनुसार, जटिल वैज्ञानिक शोधों को आगे बढ़ाने के लिए विभिन्न संस्थानों के बीच समन्वय अनिवार्य हो गया है।

संगोष्ठी में Centre for DNA Fingerprinting and Diagnostics (सीडीएफडी) के निदेशक Ullas Kolthur-Seetharam ने भी भाग लिया और जैविक मानवशास्त्र के क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने कहा कि उनका संस्थान इस दिशा में सक्रिय योगदान देने को तैयार है।

द्वितीय दिवस का मुख्य आकर्षण ‘बिल्डिंग कैपेसिटी फॉर एंशेंट डीएनए रिसर्च इन इंडिया: टेक्निकल, एथिकल एंड इंफ्रास्ट्रक्चरल चैलेंजेस एंड द रोड अहेड’ विषय पर आयोजित पैनल चर्चा रही। इसकी अध्यक्षता अभिशिक्त घोष रॉय और शिव पटेल ने की। इस चर्चा में डॉ. माधुसूदन आर. नंदिनी, डॉ. नवीन गांधी, प्रो. वी.एन. प्रभाकर, डॉ. नीरज राय, प्रो. वसंत शिंदे और प्रो. के. अशोक जैसे प्रमुख विशेषज्ञों ने भाग लिया।

पैनल चर्चा के दौरान के थांगराज ने भारत में प्राचीन डीएनए अनुसंधान की प्रमुख चुनौतियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि देश में अरबों नमूने उपलब्ध होने के बावजूद उनके संरक्षण और वैज्ञानिक उपयोग में बड़ी बाधाएं हैं। भारत की जलवायु और पर्यावरणीय परिस्थितियां नमूनों के संरक्षण के लिए चुनौतीपूर्ण हैं, जिसके कारण यूरोपीय मानक यहां प्रभावी नहीं हो पाते।

विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि प्राचीन डीएनए अनुसंधान केवल ऐतिहासिक अध्ययन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बीमारियों के विकास, मानव आहार और आनुवंशिक परिवर्तनों को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके लिए अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं, उन्नत तकनीकी संसाधनों और प्रशिक्षित मानव संसाधन की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

चर्चा के अंत में सभी विशेषज्ञों ने तकनीकी क्षमता निर्माण, नैतिक मानकों के निर्धारण और मजबूत शोध अवसंरचना विकसित करने पर सहमति जताई। यह संगोष्ठी न केवल ‘फाउंडेशन टू फ्रंटियर्स’ की शोध यात्रा को नई दिशा दे रही है, बल्कि भारत में जैविक मानवशास्त्र और प्राचीन डीएनए अनुसंधान के क्षेत्र में भविष्य की संभावनाओं को भी सशक्त बना रही है।

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