धार्मिक चेतना और आध्यात्मिक मूल्यों की रक्षा के लिए बीएचयू के डॉक्टर का उपवास, समाज में बढ़ते भ्रम पर जताई चिंता

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वाराणसी। धर्म, आस्था और आध्यात्मिक मूल्यों को लेकर समाज में बढ़ती भ्रम की स्थिति और धार्मिक प्रतीकों के कथित विकृतिकरण के विरोध में काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के सहप्राध्यापक डॉ. सुनील कुमार ने वाराणसी में उपवास शुरू किया है। सर्किट हाउस के समीप चल रहे इस उपवास के माध्यम से उन्होंने धार्मिक पहचान, सांस्कृतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना से जुड़े मुद्दों पर समाज का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है।

डॉ. सुनील कुमार का कहना है कि भारतीय संस्कृति और शास्त्रों में भोजन, व्यवहार और मानसिक शुद्धता को विशेष महत्व दिया गया है। उनके अनुसार व्यक्ति के विचार और आचरण समाज की सामूहिक चेतना को प्रभावित करते हैं। उन्होंने कहा कि जब धार्मिक संस्थानों और परंपराओं में ऐसे लोगों की भूमिका बढ़ती है, जिनकी मूल आस्था और विचारधारा अलग होती है, तब श्रद्धालुओं के मन में भ्रम और असंतोष पैदा होता है।

उन्होंने आरोप लगाया कि देश के कुछ हिस्सों, विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों में मंदिर व्यवस्थाओं और धार्मिक संस्थानों में राजनीतिक एवं प्रशासनिक हस्तक्षेप के कारण पारंपरिक धार्मिक मूल्यों को नुकसान पहुंचा है। उनका कहना है कि इससे आम श्रद्धालुओं की भावनाएं प्रभावित होती हैं और लोग स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं।

अपने वक्तव्य में डॉ. सुनील कुमार ने धार्मिक और पौराणिक पात्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज में धर्म और अधर्म, आदर्श और विरोधी प्रवृत्तियों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यदि इन सीमाओं को जानबूझकर धुंधला किया जाता है, तो इसका असर नई पीढ़ी की सोच और सांस्कृतिक समझ पर पड़ता है। उन्होंने चिंता जताई कि आज वैश्विक स्तर पर नैतिक और आध्यात्मिक संकट का एक बड़ा कारण सही और गलत के बीच का फर्क कमजोर पड़ना भी है।

तमिलनाडु और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक राजनीति का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि कई बार धार्मिक कथाओं और ऐतिहासिक पात्रों की व्याख्या राजनीतिक या वैचारिक लाभ के लिए बदली जाती है। डॉ. सुनील कुमार ने कहा कि भगवान राम को धर्म स्थापना और मर्यादा का प्रतीक माना जाता है, जबकि महाभारत के पात्रों की भूमिका अलग संदर्भों में रही है। उनके अनुसार, जब नायक और खलनायक की छवि को एक समान तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, तो समाज में भ्रम की स्थिति पैदा होती है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उपवास किसी व्यक्ति या समुदाय विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य समाज में आध्यात्मिक जागरूकता बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि मीडिया समाज का प्रभावशाली माध्यम है और इस विषय पर खुली चर्चा आवश्यक है, ताकि धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक मूल्यों को लेकर फैल रहे भ्रम को दूर किया जा सके।

डॉ. सुनील कुमार पिछले करीब दो दशकों से स्वास्थ्य और आध्यात्मिकता के संबंधों पर अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक प्रतीकों, नामों और परंपराओं के अर्थ बदलने की प्रवृत्ति व्यक्ति के मानसिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन पर भी असर डाल रही है। उन्होंने समाज से अपील की कि भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं की मूल भावना को समझते हुए जागरूकता फैलाने में सहयोग करें।

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