मेनोपॉज के बाद महिलाओं की हड्डियों की सेहत के लिए बीएचयू का नवाचार, शोध छात्रा ने विकसित की आयुर्वेदिक कैंडी

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वाराणसी। महिलाओं के स्वास्थ्य और आयुर्वेदिक चिकित्सा के क्षेत्र में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के आयुर्वेद संकाय ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय की एक शोध छात्रा ने ऐसी आयुर्वेदिक कैंडी विकसित की है, जिसे मेनोपॉज के बाद महिलाओं में होने वाले हड्डियों के दर्द, कमजोरी और अस्थि संबंधी समस्याओं में सहायक बताया जा रहा है। इस नवाचार को आयुर्वेदिक औषधियों को आधुनिक और उपयोगकर्ता-अनुकूल स्वरूप में प्रस्तुत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

यह शोध कार्य बीएचयू के आयुर्विज्ञान संस्थान (आईएमएस) के रसशास्त्र विभाग में किया गया। शोध का संचालन विभागाध्यक्ष प्रो. आनंद चौधरी के मार्गदर्शन में हुआ, जबकि डॉ. रोहित शर्मा और कायचिकित्सा विभाग की शिक्षिका डॉ. मीरा अन्तिवाल ने इसमें सहयोग प्रदान किया। इस परियोजना को एमडी तृतीय वर्ष की शोध छात्रा डॉ. कनिका नैनवाल ने पूरा किया।

शोधकर्ताओं के अनुसार, इस आयुर्वेदिक कैंडी का परीक्षण लगभग 30 महिलाओं पर किया गया। दो महीने तक चले अध्ययन में प्रतिभागियों की स्वास्थ्य स्थिति का मूल्यांकन किया गया, जिसमें हड्डियों के दर्द और शारीरिक कमजोरी में सुधार के संकेत मिले। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इन प्रारंभिक परिणामों की पुष्टि के लिए बड़े स्तर पर और अधिक विस्तृत क्लिनिकल परीक्षण आवश्यक होंगे।

प्रो. आनंद चौधरी ने बताया कि पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधियों को आधुनिक जीवनशैली के अनुरूप बनाना समय की आवश्यकता है। इसी सोच के तहत औषधीय योग को कैंडी के रूप में विकसित किया गया है, ताकि महिलाएं इसे आसानी से अपने दैनिक जीवन में शामिल कर सकें। स्वादिष्ट और सुविधाजनक स्वरूप होने के कारण इसके नियमित सेवन की संभावना भी बढ़ जाती है।

विशेष बात यह है कि शोध टीम ने इसी औषधीय संयोजन को पारंपरिक ‘वटी’ यानी गोली के रूप में भी तैयार किया है। इससे मरीज अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी स्वरूप का उपयोग कर सकते हैं।

इस आयुर्वेदिक उत्पाद के निर्माण में शतावरी, आंवला, रागी, मुक्ताशुक्ति भस्म और गुड़ जैसे पोषक एवं अस्थि-पोषक तत्वों का उपयोग किया गया है। आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार ये तत्व हड्डियों को मजबूती प्रदान करने, कैल्शियम की पूर्ति में सहयोग देने तथा शरीर को आवश्यक पोषण उपलब्ध कराने में सहायक हो सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध महिला स्वास्थ्य और आयुर्वेदिक नवाचार के क्षेत्र में नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। साथ ही यह पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शोध के समन्वय का एक सफल उदाहरण भी है।

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