काशी में आयोजित हुआ भारतीय भाषा समागम-2026 : प्राचीन ज्ञान को आधुनिक विज्ञान, तकनीक और शोध से जोड़ने पर मंथन, 19 भाषा विद्वानों का सम्मान
वाराणसी। हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर काशी से भारतीय भाषाओं को वैश्विक ज्ञान-विमर्श की शक्ति बनाने और भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान, शिक्षा, तकनीक और शोध से जोड़ने का संदेश दिया गया। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन पीठ सभागार में हिन्दुस्थान समाचार की ओर से ‘भारतीय ज्ञान परंपरा, क्षेत्रीय भाषाएं और समृद्ध भारत’ विषय पर आयोजित भारतीय भाषा समागम-2026 में विद्वानों ने भारतीय भाषाओं और ज्ञान परंपरा के वर्तमान एवं भविष्य पर विस्तार से मंथन किया।
समागम में वक्ताओं ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल अतीत की उपलब्धियों के रूप में देखने के बजाय उसे वर्तमान विज्ञान, शिक्षा और तकनीक के साथ जोड़ने की आवश्यकता है। इसके लिए प्राचीन ग्रंथों और पांडुलिपियों के जानकारों के साथ आधुनिक विषयों के विशेषज्ञों के बीच संवाद बढ़ाना होगा। वक्ताओं ने काशी को इस दिशा में महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित करने की आवश्यकता भी जताई।
कार्यक्रम में भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और ज्ञान परंपरा में योगदान देने वाले 19 भाषा विद्वानों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ‘युगवार्ता’ और ‘नवोत्थान’ पत्रिका का लोकार्पण भी किया गया।

पुरातन और आधुनिक ज्ञान के बीच की दीवार तोड़नी होगी: डॉ. अग्निहोत्री
समागम के मुख्य अतिथि केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के पूर्व कुलपति डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कहा कि भारत के पुरातन ज्ञान और आधुनिक ज्ञान के बीच एक दीवार खड़ी हो गई है। इस दीवार को तोड़कर दोनों के बीच संवाद का पुल बनाने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की बात करने का अर्थ हजारों वर्ष पीछे जाकर बैठना नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हमारे पूर्वजों द्वारा अर्जित ज्ञान को वर्तमान विज्ञान और शिक्षा के साथ जोड़कर देखा जाए और यह समझने का प्रयास किया जाए कि वह ज्ञान आज के समय में किस प्रकार उपयोगी हो सकता है।
उन्होंने कहा कि काशी भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक ज्ञान के बीच टूट चुके पुल को दोबारा जोड़ने का केंद्र बन सकती है। काशी में भौतिक विकास के लिए कई कॉरिडोर बने हैं। अब जरूरत ज्ञान के क्षेत्र में भी ऐसा कॉरिडोर तैयार करने की है, जहां प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का सार्थक संवाद हो सके।

भारतीय ज्ञान परंपरा केवल दर्शन और अध्यात्म तक सीमित नहीं
डॉ. अग्निहोत्री ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल दर्शन और अध्यात्म तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा। भारत ने गणित, रसायन विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, चिकित्सा और खगोल विज्ञान सहित अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण ज्ञान अर्जित किया था।
उन्होंने संस्कृत में उपलब्ध पांडुलिपियों और आधुनिक विषयों के विशेषज्ञों के बीच संवाद की आवश्यकता बताते हुए कहा कि दोनों क्षेत्रों के विद्वानों को साथ बैठना होगा। तभी प्राचीन भारतीय ज्ञान को आधुनिक संदर्भों में समझने और उसका उपयोग करने की दिशा में ठोस कार्य हो सकेगा।
उन्होंने भारतीय भाषाओं को लेकर समाज में बनी मानसिकता पर भी सवाल उठाया। कहा कि अंग्रेजी में बोलने वाले व्यक्ति को विद्वान और अपनी भाषा में बोलने वाले व्यक्ति को उससे कमतर समझने की सोच बदलनी होगी। भारत की सभी भाषाएं अपने भीतर ज्ञान के साथ एक समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को लेकर चलती हैं।
ज्ञान का निर्माण नहीं, साक्षात्कार होता है: मुकुल कानिटकर
मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रचार टोली के सदस्य मुकुल कानिटकर ने भारतीय ज्ञान परंपरा की अवधारणा पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा किसी नई चीज की निर्मिति की परंपरा नहीं, बल्कि शाश्वत रूप से विद्यमान ज्ञान के साक्षात्कार की परंपरा है।
उन्होंने कहा कि विविधता के भीतर एकत्व को पहचानना ज्ञान है और उसी एक सत्य के विशेष स्वरूप को समझना विज्ञान है। इसे समझाते हुए उन्होंने न्यूटन का उदाहरण दिया। कहा कि न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का निर्माण नहीं किया था, बल्कि प्रकृति में पहले से मौजूद गुरुत्व के सिद्धांत का साक्षात्कार किया था।
कानिटकर ने कहा कि भारत की भाषाओं को केवल क्षेत्रीय भाषाएं कहना उचित नहीं है। भारत की सभी भाषाएं अखिल भारतीय हैं। अलग-अलग स्थानों पर भाषा का स्वरूप बदल सकता है, लेकिन उसके पीछे का भाव नहीं बदलता।
उन्होंने कहा कि भाषा मनुष्य को ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर लेकर जाती है। इसलिए भारतीय भाषाओं का महत्व केवल संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि वे समाज, संस्कृति और ज्ञान को जोड़ने का माध्यम भी हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा को तकनीक से जोड़ने की जरूरत
मुकुल कानिटकर ने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज तकनीक ज्ञान के प्रसार का बड़ा माध्यम बन चुकी है। ऐसे में भारतीय भाषाओं और उनमें उपलब्ध ज्ञान को नई तकनीक से जोड़कर व्यापक समाज तक पहुंचाया जाना चाहिए।
उन्होंने काशी की ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह नगरी सदियों से ज्ञान और विचार-विमर्श का केंद्र रही है। आधुनिक दौर में भी काशी भारतीय ज्ञान परंपरा की नई धारा का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकती है।
15 भाषाओं में समाचार उपलब्ध करा रहा हिन्दुस्थान समाचार: मार्डीकर
हिन्दुस्थान समाचार समूह के अध्यक्ष अरविंद भालचंद्र मार्डीकर ने संस्था की यात्रा और भारतीय भाषाओं के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्थान समाचार एक साथ 15 भाषाओं में समाचार उपलब्ध कराने वाली विश्व की एकमात्र बहुभाषी न्यूज एजेंसी है।
उन्होंने कहा कि संस्था की लगभग आठ दशक की यात्रा भारतीय भाषाओं में विश्वसनीय सूचनाएं लोगों तक पहुंचाने की प्रतिबद्धता से जुड़ी रही है। भारत की भाषाओं में केवल शब्द नहीं, बल्कि देश की ज्ञान परंपरा, सामाजिक अनुभव और सांस्कृतिक विरासत भी सुरक्षित है।
उन्होंने बताया कि हिन्दुस्थान समाचार अब देश की सीमाओं से आगे वैश्विक स्तर पर भी अपनी उपस्थिति मजबूत करने की दिशा में कार्य कर रहा है। रूसी समाचार एजेंसी के साथ कार्य शुरू किया गया है, जबकि जापानी समाचार एजेंसी से भी बातचीत चल रही है।
19 भाषा विद्वानों का हुआ सम्मान
भारतीय भाषा समागम के दौरान देश की भाषाई और ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में योगदान देने वाले 19 भाषा विद्वानों को सम्मानित किया गया। अतिथियों ने विद्वानों को सम्मान प्रदान करते हुए भारतीय भाषाओं के संरक्षण और उनके माध्यम से ज्ञान के विस्तार में किए जा रहे कार्यों की सराहना की।
वक्ताओं ने कहा कि भारतीय भाषाओं को समृद्ध बनाने में साहित्यकारों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और भाषा विद्वानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नई पीढ़ी को भी इस परंपरा से जोड़ने की आवश्यकता है, जिससे भारतीय भाषाएं आधुनिक ज्ञान और तकनीक की भाषा के रूप में भी आगे बढ़ सकें।
‘युगवार्ता’ और ‘नवोत्थान’ पत्रिका का लोकार्पण
समागम में ‘युगवार्ता’ और ‘नवोत्थान’ पत्रिका का लोकार्पण भी किया गया। अतिथियों ने दोनों पत्रिकाओं का विमोचन किया। इस अवसर पर भारतीय भाषाओं में गंभीर वैचारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श को आगे बढ़ाने में पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका पर भी चर्चा हुई।

वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ हुआ समागम का शुभारंभ
भारतीय भाषा समागम-2026 का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच मां भारती के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ। मुख्य अतिथि डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, मुख्य वक्ता मुकुल कानिटकर, केंद्रीय उच्च शिक्षा संस्थान सारनाथ के कुलपति भिक्षु प्रो. (डॉ.) वंगछुग दोर्जे नेगी, राज्य सूचना आयुक्त पदुमनारायण (पीएन) द्विवेदी और पूर्व पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी ने संयुक्त रूप से कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता हिन्दुस्थान समाचार समूह के अध्यक्ष अरविंद भालचंद्र मार्डीकर ने की। मुख्य समन्वयक एवं क्षेत्रीय संपादक डॉ. राजेश तिवारी ने अतिथियों का स्वागत किया। महामना पं. मदनमोहन मालवीय हिंदी पत्रकारिता संस्थान के निदेशक डॉ. नागेन्द्र कुमार सिंह की विशेष उपस्थिति रही। कार्यक्रम का संचालन हिन्दुस्थान समाचार के संपादक जितेंद्र तिवारी ने किया।
समागम में भारतीय ज्ञान परंपरा, भाषाओं, आधुनिक विज्ञान और तकनीक के बीच समन्वय को भविष्य की आवश्यकता बताते हुए इस दिशा में संस्थागत स्तर पर प्रयास बढ़ाने पर जोर दिया गया। वक्ताओं का कहना था कि भारतीय भाषाओं को केवल साहित्य और संस्कृति तक सीमित रखने के बजाय शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और शोध की प्रभावी भाषा के रूप में आगे बढ़ाना होगा। काशी से निकला यह संदेश इसी सोच पर केंद्रित रहा कि भारत की ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच संवाद जितना मजबूत होगा, भारतीय भाषाओं की वैश्विक भूमिका भी उतनी ही व्यापक होगी।

