महामना की रक्षा में बलिदान हुए थे बचऊ वीर, बीएचयू के समीप पहलवान के नाम पर आज भी है अखाड़ा

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बीएचयू की स्थापना के दौरान जमीन विवाद में मालवीय जी की रक्षा करने का स्थानीय लोगों का दावा, पहलवान बचऊ वीर की स्मृति आज भी जीवंत है काशी की कुश्ती परंपरा 

तीन बार हमले के प्रयास और तीसरे हमले में महामना को बचाते हुए जान गंवाने की सुनाई जाती है कहानी, बीएचयू परिसर के समीप आज भी बचऊ वीर के नाम से अखाड़े का उल्लेख

वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की कहानी में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के साथ अनेक लोगों के सहयोग, त्याग और संघर्ष का उल्लेख मिलता है। इसी कड़ी में सीर गोवर्धनपुर के पहलवान बचऊ वीर का नाम स्थानीय स्तर पर सम्मान के साथ लिया जाता है। स्थानीय लोगों और बचऊ वीर जन सेवा समिति से जुड़े लोगों के अनुसार, बीएचयू की स्थापना के दौरान जमीन को लेकर उत्पन्न विवाद में बचऊ वीर ने पंडित मदन मोहन मालवीय की रक्षा करते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था।

स्थानीय परंपरा में सुनाई जाने वाली कहानी के अनुसार विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए भूमि जुटाने और निर्माण की प्रक्रिया के दौरान विवाद की स्थिति बनी थी। समिति से जुड़े लोगों का दावा है कि इसी दौरान महामना पर तीन बार जानलेवा हमला करने का प्रयास किया गया। तीनों मौकों पर बचऊ वीर ने अपनी पहलवानी और साहस के बल पर मालवीय जी की रक्षा की।

बताया जाता है कि बचऊ वीर क्षेत्र के प्रसिद्ध पहलवान थे और मालवीय जी के साथ उनका निकट संबंध था। विश्वविद्यालय की स्थापना से जुड़े कार्यों के लिए महामना जब क्षेत्र में आते थे, तब बचऊ वीर उनके साथ रहते और सुरक्षा में सहयोग करते थे। स्थानीय गाथाओं में उनकी मजबूत कद-काठी, पहलवानी और साहस का विशेष रूप से उल्लेख किया जाता है।

तीसरे हमले में हो गए बलिदान
स्थानीय लोगों के अनुसार जमीन विवाद को लेकर हुई पंचायत के दौरान महामना पर तीसरी बार हमला किया गया। इस दौरान भी बचऊ वीर आगे आए और मालवीय जी को सुरक्षित बचाने का प्रयास किया। संघर्ष के दौरान उनकी जान चली गई। स्थानीय लोग इसे महामना की रक्षा में दिया गया उनका बलिदान मानते हैं।


हालांकि, इस घटना के विवरण को लेकर प्रकाशित सामग्री और स्थानीय कथाओं में भिन्नताएं मिलती हैं। कुछ विवरणों में रास्ते में हमला होने और बचऊ वीर द्वारा मालवीय जी को सुरक्षित निकालने के बाद हमलावरों से भिड़ने की बात कही गई है। इसलिए घटना का यह विवरण स्थानीय लोकगाथा और दावों के रूप में ही सामने आता है।

कुश्ती परंपरा में आज भी जीवित है स्मृति
बचऊ वीर की पहचान केवल स्थानीय लोकनायक के रूप में ही नहीं, बल्कि काशी की पारंपरिक कुश्ती संस्कृति से भी जुड़ी हुई है। बीएचयू के समीप बचऊ वीर अखाड़े का उल्लेख मिलता है। नाग पंचमी के अवसर पर यहां दंगल आयोजित होने की परंपरा भी बताई जाती है, जिसमें स्थानीय और अन्य पहलवान हिस्सा लेते हैं।

स्थानीय लोगों और बचऊ वीर जन सेवा समिति की ओर से समय-समय पर बीएचयू में बचऊ वीर की प्रतिमा स्थापित करने की मांग भी उठाई जाती रही है। समिति का कहना है कि विश्वविद्यालय की स्थापना में योगदान देने वाले स्थानीय लोगों की भूमिका को भी इतिहास और नई पीढ़ी के सामने लाया जाना चाहिए।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना चार फरवरी 1916 को हुई थी। विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए व्यापक स्तर पर भूमि और आर्थिक सहयोग जुटाया गया था। स्थानीय लोगों के लिए बचऊ वीर की गाथा आज भी साहस, त्याग और सेवा का प्रतीक है। सीर गोवर्धनपुर में उनकी स्मृति में आज भी ‘बचऊ वीर अमर रहें’ का उद्घोष सुनाई देता है।

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