बाबा विश्वनाथ-मां गौरा का गौना : हल्दी रस्म के लिए निकला दुर्गा मंदिर का महंत परिवार, दुर्गाकुंड मंदिर से सोनारपुरा होते हुए टेढ़ीनीम तक शोभायात्रा

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वाराणसी। महाशिवरात्रि पर वैदिक विधि-विधान से संपन्न हुए बाबा विश्वनाथ और मां गौरा के दिव्य विवाह के बाद अब गौना की तैयारियां पूरे उत्साह के साथ शुरू हो गई हैं। रंगभरी एकादशी से पूर्व होने वाली हल्दी रस्म के लिए काशी के प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर के महंत परिवार ने मंगलवार को पारंपरिक ढंग से हल्दी और विवाह सामग्री लेकर टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास के लिए प्रस्थान किया।

दुर्गाकुंड महंत कौशलपति द्विवेदी स्वयं बाबा का हल्दी से सजा थाल हाथों में लेकर चल रहे थे। उनके साथ मंदिर परिवार के सदस्य और हजारों श्रद्धालु इस पावन यात्रा में शामिल हुए।

पारंपरिक लोकाचार के साथ निकली शोभायात्रा
हल्दी यात्रा पूरी तरह से पारंपरिक लोकाचार के अनुरूप निकाली गई। दुल्हन की विदाई से जुड़े सभी मांगलिक प्रतीकों को सुसज्जित थालों में सजाकर ले जाया गया। रुद्राक्ष की माला, खड़ाऊ, मेवा, साड़ी, फल और अन्य पूजन सामग्री श्रद्धापूर्वक साथ रखी गई।

महंत परिवार के आगे-आगे शहनाई और डमरू दल की गूंजती धुनों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। “हर-हर महादेव” के जयकारों से पूरा मार्ग शिवमय हो उठा।

दुर्गाकुंड मंदिर से सोनारपुरा होते हुए टेढ़ीनीम तक यात्रा
यह यात्रा दुर्गा मंदिर से पैदल सोनारपुरा तक जाएगी। इसके बाद चौक क्षेत्र में श्रद्धालु एकत्र होकर टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास के लिए रवाना होंगे। सैकड़ों की संख्या में काशीवासी इस यात्रा में शामिल होकर अपनी आस्था और उत्साह का परिचय दे रहे हैं।

रास्ते भर श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर इस दिव्य परंपरा का स्वागत किया।

रंगभरी एकादशी पर होगा मां गौरा का गौना
महाशिवरात्रि के दिन काशी विश्वनाथ मंदिर में विवाह संपन्न होने के बाद रंगभरी एकादशी को मां गौरा का गौना कराया जाता है। यह काशी की विशिष्ट धार्मिक परंपरा है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस दिन बाबा विश्वनाथ विधिवत मां गौरा को अपने साथ काशी लाते हैं और मंदिर परिसर में रंग और गुलाल के साथ उत्सव मनाया जाता है।

“सौभाग्य की अनुभूति” – अश्वनी शुक्ला
यात्रा में शामिल अश्वनी शुक्ला ने इसे अपने जीवन का विशेष क्षण बताया। उन्होंने कहा कि बाबा विश्वनाथ और मां गौरा की हल्दी रस्म में शामिल होना उनके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने कामना की कि बाबा का आशीर्वाद सदैव बना रहे और वे हर वर्ष इस दिव्य परंपरा में भाग लेते रहें।

आस्था और लोकसंस्कृति का संगम

काशी की यह सदियों पुरानी परंपरा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति और सामाजिक एकता का भी अद्भुत उदाहरण है। बाबा विश्वनाथ और मां गौरा के गौना उत्सव की तैयारियों के साथ काशी एक बार फिर शिवभक्ति में सराबोर हो उठी है।

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